शुक्रवार, 7 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १४)

प्याली में सागर समाने जैसा है भक्ति का भाव

महर्षि के होठों का मन्द हास्य भक्ति-किरणों की तरह सभी की अंतर्भावना में व्याप्त हो गया। सबकी रोमावलि पुलकित हो आयी। दीर्घजीवी महर्षि लोमश का सान्निध्य था ही कुछ ऐसा अनूठा। अपनी भक्ति के प्रभाव से वह भगवन्मय हो गये थे। उनसे कुछ और सुनने की चाहत सभी को थी। सम्भवतः हिमशिखर भी इसी आशा में मौन साधे नीरव खड़े थे। हिमप्रपातों की गूँज मद्धम हो गयी थी। आकाश भी भक्त के अंतःकरण की भाँति निरभ्र और शान्त था। सभी को प्रतीक्षा थी तो बस महर्षि के वचनों की।
    
अंतर्यामी ऋषि कहने लगे- ‘‘महनीय जनों! जीवन की दीर्घता नहीं, लोकसेवापरायणता ही वरेण्य है। कौन कितनी आयु जिया, इसकी गणना करने के बजाय यह महत्त्वपूर्ण है कि कौन उसे किस तरह जिया। भगवान की चेतना का विस्तार ही यह संसार है। जो इस अनुभव को जीता है, वही भक्त है। भावों की शुद्धि, भावों की भगवान में विलीनता, भगवन्मय जीवन यही भक्त के लक्षण हैं। इन्हीं की व्याख्या देवर्षि ने अपने सूत्रों में की है। मेरा आग्रह है कि देवर्षि अपनी भक्ति गाथा का विस्तार करें।’’
    
महर्षि लोमश के इन वचनों के साथ ही सभी के नेत्र देवर्षि के मुख पर जा टिके। देवर्षि के चेहरे पर सात्विक सौम्यता विद्यमान थी। उनके होठों से मन्दगति से नारायण नाम का जप चल रहा था। उनके हृदय की भावनाएँ इस नामजप के साथ प्रभु को अर्पित हो रही थीं। महर्षि लोमश के वचनों को सुनकर उन्होंने एक सूत्र का उच्चारण किया-
‘यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति॥ ६॥’
भक्ति के तत्त्व को जानने वाला उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध हो जाता है और आत्मा में रमण करने वाला हो जाता है।
    
देवर्षि के इस सूत्र में उपस्थित जनों के चिंतन सूत्र गुँथने लगे। उनकी भाव चेतना में कुछ अनोखा स्पन्दित हुआ। वहाँ की सूक्ष्मता में कई लहरें उठीं और भक्ति प्रवाह में विलीन हो गयीं। जिज्ञासाएँ भी सघन हुईं, मस्ती, स्तब्धता और आत्मरमण की यह सघनता कैसी है? यह जहाँ अपने पूर्ण रूप में है, वहाँ कैसी है भक्ति की ज्योत्सना? कैसी है छवि और छटा? ऋषियों एवं देवों के चिंतन की इस लय में प्रकृति ने कुछ घोला, मौन हिमालय के अंतर में भी आह्वान के मूक स्वर उठे और तभी सभी की आँखें उस ज्योतिपुञ्ज की ओर उठीं जो इन्हीं क्षणों में साकार हुआ था। यह दैवी उपस्थिति मुग्ध करने वाली थी। इस उपस्थिति मात्र से ही कुछ भाव घटाएँ घिरीं और अंतस् में बरस गयीं।
    
इस भाववृष्टि के बीच सभी ने उस ओर निहारा जिधर ज्योतिपुञ्ज प्रकट हुआ था। अब उस स्थान पर भगवान दत्तात्रेय खड़े थे, साथ में थे उनके पार्षद। दत्तात्रेय और उनके पार्षदों की ज्योतिर्मयी उपस्थिति ने देवात्मा हिमालय के इस आँगन में नयी पावनता एवं चेतनता का संचार कर दिया। दत्तात्रेय ने अपनी उपस्थिति के साथ ही सप्तर्षियों को प्रणाम किया। विशेषतया महर्षि अत्रि को जो उनके पिता भी थे। इसके बाद उन्होंने सभी ऋषियों का अभिवादन किया। महर्षि लोमश जैसे परमर्षियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपने पास आसीन किया।

देवर्षि तो दत्तात्रेय के आगमन से गद्गद् हो गये, क्योंकि उन्हें इस सत्य पर पूर्ण आस्था थी कि उनके आराध्य भगवान नारायण ही अपने एक अंश से दत्तात्रेय के रूप में प्रकट हुए हैं। भक्ति की परम पूर्णता सहज ही उनमें वास करती है। जो दत्तात्रेय की विशेषताओं से परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि ये अवधूत शिरोमणि साधकों को मार्गदर्शन करने के लिए इस धराधाम में विचरण करते हैं। जूनागढ़ में गिरनार पर्वत इनका स्वाभाविक वास स्थान है। तंत्र, भक्ति एवं योग की अनगिनत साधनाएँ इनसे प्रकट हुई हैं। रसेश्वर तंत्र इन्हीं की देन है। ये परम योगी, महातंत्रेश्वर एवं श्रेष्ठतम भक्त हैं। अपने साधना जीवन में इनकी एक झलक भर मिलना साधकों का विरल सौभाग्य होता है। वाणी जहाँ रुकती है, शब्द जहाँ थकते हैं, मन जहाँ मौन होता है, वहाँ से परम भक्त अवधूत शिरोमणि दत्तात्रेय का चरित्र प्रारम्भ होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३३

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 अपनी रोटी मिल बाँट कर खाओ

एक राजा था। उसका मंत्री बहुत बुद्धिमान था। एक बार राजा ने अपने मंत्री से प्रश्न किया – मंत्री जी! भेड़ों और कुत्तों की पैदा होने कि दर में त...