सोमवार, 17 मई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १८)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

जीवन यापन करने के लिए हमें नौ उपकरण प्राप्त हैं। (1) नेत्र (2) जिह्वा (3) नासिका (4) कान (5) त्वचा (6) मन (7) बुद्धि (8) चित्त (9) अहंकार, इन्हीं के माध्यम से हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इस ज्ञान को ही यथार्थ मानते हैं। पर थोड़ी गहराई के साथ देखा जाय तो प्रतीत होगा कि यह सभी उपकरण एक सीमित और सापेक्ष जानकारी देते हैं, इनके माध्यम से मिली जानकारी न तो यथार्थ होती है और न पूर्ण। इसलिए उन अपूर्ण साधनों से मिली जानकारी को सही मान बैठना ‘भूल’ ही कही जायगी। वेदान्त की भाषा में इस अपूर्ण जानकारी को ‘स्वप्न’ मिथ्या कहकर उसका वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला गया है।

संसार में अनेक कारणों से अनेक शब्द कम्पन उत्पन्न होते रहते हैं, इन ध्वनि तरंगों की गति भिन्न-भिन्न होती है। मनुष्य के कान केवल उतने ही ध्वनि कम्पन पकड़ सुन सकते हैं जिनकी गति 33 प्रति सेकिंड से लेकर 40 प्रति सेकिंड के बीच में होती है। इससे कम या ज्यादा गति वाले कम्पन अपने कानों की पकड़ में नहीं आते। इस परिधि के बाहर विचरण करने वाला प्रवाह इतना अधिक है जिसकी तुलना में सुनाई देने वाले शब्दों को लाख करोड़वां हिस्सा कह सकते हैं। इतनी स्वल्प ध्वनि को सुन सकने वाले कानों को शब्द सागर की कुछ बूंदों का ही अनुभव होता है। शेष के बारे में वे सर्वथा अनजान ही बने रहते हैं। इस अपूर्ण उपकरण के माध्यम से ध्वनि के माध्यम से विचरण करने वाले ज्ञान को सर्वथा स्वल्प ही कहा जा सकता है और उतने से साधन से मिलने वाली जानकारी के आधार पर वस्तु स्थिति समझने का दावा नहीं कर सकते।

त्वचा के माध्यम से मिलने वाली जानकारी भी कानों की तरह ही अपूर्ण होती है साथ ही भ्रान्त भी। हाथ पर एक मिनट तक बर्फ रखे रहें इसके बाद उसी हाथ को साधारण जल में डुबोए। लगेगा पानी गरम है। इसके बाद हाथ पर कुछ देर कोई गरम चीज रखे रहें, इसके बाद हाथ को उसी पानी में डुबाये प्रतीत होगा पानी ठण्डा है। जल एक ही तापमान का था पर बर्फ अथवा गरम चीज रखने के बाद हाथ डुबाने पर अलग अलग तरह के अनुभव हुए। ऐसी त्वचा की गवाही पर क्या भरोसा किया जाय जो कुछ का कुछ बताती है। ठण्ड और गर्मी की न्यूनाधिकता का अन्तर भी त्वचा एक सीमा तक ही बताती है। अत्यधिक गरम या अत्यधिक ठण्डी वस्तु में तापमान या शीतमान का जो अन्तर होता है उसे त्वचा नहीं बता सकती। ऐसी सीमित शक्ति वाली त्वचा इन्द्रिय के माध्यम से हम समग्र सत्य को समझ सकने में कैसे समर्थ हो सकते हैं?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २७
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

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