बुधवार, 14 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ४)

वासनाओं के भावनाओं में रूपांतरण की कथा

आह्वान के स्वरों की गूँज हिमशिखरों में संव्याप्त होती हुई परा प्रकृति की सूक्ष्मता को स्पन्दित करने लगी। ये स्पन्दन क्रमिक रूप से तीव्र होते गये और फिर सहसा निरभ्र आकाश में एक नया चन्द्रोदय हुआ। इस चन्द्रमा का प्रकाश, आभा, सौन्दर्य स्वयं में सम्पूर्ण था। आकाश में दो चन्द्रमाओं की उपस्थिति ने एक बारगी सभी को अचरज में डाल दिया। परन्तु दूसरे ही क्षण ऋषि मण्डल ने आश्वस्ति की साँस ली। उन्होंने देखा कि यह नवोदित चन्द्रमा शनैः-शनैः हिमालय की उस दिव्य घाटी में अवतरित हो रहा था। उसके प्रकाश ने हिमालय के कण-कण को आच्छादित और आह्लादित कर दिया। वहाँ उपस्थित देवों एवं महर्षियों के अंतस् में भी पुलकन की पूर्णिमा चमक उठी।
    
उन्होंने अनुभव कर लिया था कि यह नवोदित चन्द्रोदय और कुछ नहीं स्वयं देवर्षि नारद का आगमन है। उनके इस हिमधरा पार आगमन के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण प्रभुनाम से सम्पूरित सामगान के स्वरों से गूँज उठा। बड़ी मधुर और अलौकिक थी यह स्वर लहरी। इसकी यथार्थ अनुभूति तो वही कर सकते हैं, जो वहाँ स्वयं प्रत्यक्ष अथवा सूक्ष्म शरीर से उपस्थित थे। परन्तु जिन्हें अपनी भावनाओं में भी इसका अहसास हो सका वे भी देवर्षि का कृपाप्रसाद पाये बिना नहीं रह सके। देवर्षि की इस उपस्थिति का आभास पाते ही समूचा ऋषि मण्डल उनकी अभ्यर्थना के लिए खड़ा हो गया। उस दिव्य घाटी में पुनः एक बार फिर सुमधुर अनुगूँज उठी-
     अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्ति शाङ्र्गध्रन्वतः।
     गायन्माद्यन्निदं तन्भया रमयत्यातुरं जगत्॥
‘अहो! देवर्षि नारद आप धन्य हैं, जो वीणा बजाते, हरिगुण गाते और आनन्दित होते हुए इस दुःखी संसार को आनन्दित करते रहते हैं।’
    
पीत वस्त्र पहने, हाथों में वीणा थामे देवर्षि का यह स्वरूप बड़ा मनोहर था। उन्होंने ऋषियों की अभ्यर्थना का उत्तर एक पवित्र मुस्कान के साथ दिया। ‘‘आज आप सब महर्षियों ने मुझे क्यों स्मरण किया’’- देवर्षि के इन स्वरों में बड़ा सुमधुर आध्यात्मिक संगीत था। इसका उत्तर वेदव्यास ने दिया- ‘‘हे देवर्षि! आपने सदा ही मानव एवं मानवता का मार्गदर्शन किया है। जब भी कोई कहीं भटका, आपने उसे राह दिखाई। मनुष्य की भावनात्मक भटकन आपने ही दूर की है। आपके संसर्ग एवं संस्पर्श से कितने ही भटके हुए मनुष्य महर्षि बने हैं। आज कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि समूचा समुदाय ही भटक गया है।’’
    
‘‘महर्षि व्यास का कथन सर्वथा उचित है देवर्षि’’, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपनी बात कहना प्रारम्भ की। उनकी वाणी में स्वाभाविक प्रखरता थी। वह कह रहे थे कि ‘‘आज भावनाओं की सार्थकता ही खो गयी है। त्याग एवं तप के स्थान पर स्वार्थ एवं वासना इसका पर्याय बन गये हैं। प्रेम के ढाई अक्षरों की पवित्रता आज लुप्त है। यह तो बस दैहिक वासनाओं की तृप्ति का पर्याय है। वासनाओं में डूबे हुए लोग स्वयं को प्रेम पुजारी मानते हैं। कथाएँ प्यार की कही जाती हैं-कर्म नफरत भरे किये जाते हैं। भावनाओं में घुली वासनाओं की इस कालिख ने लगभग सभी की अंतर्चेतना को ग्रंथियों से भर दिया है। सभी अर्थ खो गये हैं, बस अनर्थ ही अनर्थ है।’’
    
‘‘भगवती गायत्री कल्याण करेंगी ब्रह्मर्षि! जगन्माता अपनी संतानों को सम्हालेंगी अवश्य। हाँ! यह सच है कि अभी स्थिति विकट है।’’ देवर्षि ने ब्रह्मर्षि को उत्तर देने के साथ ही सभी को समझाते हुए कहा- ‘‘भक्ति के बिना वासनाओं का भावनाओं में परिवर्तन सम्भव नहीं। माँ गायत्री भी भक्ति का अर्घ्य चढ़ाने पर ही वरदायी होती हैं। गायत्री के चौबीस अक्षरों में समायी चौबीस महाशक्तियाँ भक्ति से ही जाग्रत होती हैं।’’ देवर्षि के इस कथन पर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपनी सहमति प्रदान की। महर्षि पुलह एवं क्रतु ने भी उनका अनुमोदन करते हुए कहा- ‘‘देवर्षि आप भक्ति तत्त्व की व्याख्या करें। इस तत्त्व का मर्मज्ञ भला आपसे अधिक और कौन हो सकता है। जिस तरह से ब्रह्मर्षि विश्वामित्र गायत्री महाविद्या के आचार्य हैं, ठीक उसी भाँति आप भक्ति के आचार्य हैं। मानव कल्याण के लिए आज दोनों का सुखमय संयोग आवश्यक है।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३

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