बुधवार, 21 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ८)

भक्ति से व्यक्तित्व बन जाता है अमृत का निर्झर

हिमालय के आंगन में प्रेममयी जगदम्बा के प्रकाश का उद्भास देर तक बना रहा। धीरे-धीरे यह प्रकाश वहाँ उपस्थित देवों, ऋषियों व सिद्धों के अन्तस् में समा गया। परमप्रेम की इस अनुभूति ने सब को विभोर कर दिया। सभी हर्षित थे, गद्गद् थे, पुलकित थे। भक्ति की विह्वलता उनकी आँखों से छलक रही थी। उनके अन्तर्भावों में भक्ति के रहस्यों को और भी अधिक जानने की उत्कण्ठा हुलसने लगी थी। सभी के मन देवर्षि की ओर उन्मुख थे, केन्द्रित थे। स्वयं अन्तर्यामी परमात्मा का मन कहे जाने वाले देवर्षि ने इन सभी महाविभूतियों के मानसिक स्पन्दनों की अनुभूति पा ली। वह स्वयं भी भक्ति का अगला दुर्लभ सूत्र सुनाना चाहते थे। सत्य जिज्ञासा, सद्गुरु को और भी कुछ अधिक दे डालने को प्रेरित करती है।
    
देवर्षि के हृदय में भी भावों का शतदल खिला और उसकी सुरभि वाणी से बहने लगी। वह कह रहे थे- ‘‘प्रेम विकसित हो तो अहं विगलित हुए बिना नहीं रहता। और जब अहं ही नहीं तब स्वार्थ कैसा? ऐसे में बचती है तो सिर्फ कल्याण भावना, जगती के कल्याण की कामना, अखिल सृष्टि चराचर के कल्याण की प्रार्थना। व्यक्तित्व में परम दुर्लभ अमृतत्त्व विकसित होता है। मेरे भक्ति दर्शन का अगला सूत्र भी यही है-
अमृतस्वरूपा च ॥ ३॥  
भक्ति अमृत रूपा है।
    
जिसमें भक्ति अपनी सम्पूर्णता में खिली, वह व्यक्तित्व स्वयं में अमृत का निर्झर बन जाता है। असंख्य उसके पावन स्पर्श से नवजीवन, दिव्य जीवन पाते हैं। उनकी प्राण चेतना में भक्ति का संचार होता है।’’
    
महर्षि वामदेव, ब्रह्मर्षि भृत्समद की अन्तर्चेतना देवर्षि के इन वचनों को सुनकर दिव्य पुलक से पूरित हो गयी। वे गहन भावसमाधि में डूब गए। अन्य ऋषिजनों ने इस सत्य को अनुभव किया। सभी कह उठे- ‘‘धन्य हैं देवर्षि आप। आपकी अमृतवाणी भावचेतना में समाधि का संचार करती है।’’ ऋषियों के इस कथन पर परम भागवत नारद ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े और धीमे स्वरों में कहा- ‘‘धन्यता तो भगवान् शिव में है। वे विषपायी प्रभु नीलकण्ठ भोलेनाथ न केवल स्वयं अमर हैं, बल्कि असंख्य भक्तों को अमरता का वरदान देते रहते हैं। भक्ति का परमोज्ज्वल आदर्श हैं वे। उनकी लीलाओं में भक्ति का स्वाभाविक विहार है।’’

नारद के कथन की सत्यता को सभी ने अनुभव किया। हिमालय के दिव्य परिसर में उपस्थित इन ऋषियों में अनेक चिरजीवी भी थे। उन्होंने भगवान् सदाशिव को, उनकी लीलाओं को स्वयं देखा था। वे उनके साक्षी ही नहीं, सहभागी भी बने थे। इनमें से महर्षि भृत्सभद एवं परमर्षि क्रतु को स्मरण हो आयी- भगवान् महादेव के विषपान की लीला। क्रतु बोल उठे- ‘‘सत्य है देवर्षि! भगवान् शिव न होते तो यह सृष्टि भी नहीं होती। वे ही सृष्टि के आदि- मध्य एवं अन्त हैं। जब-जब सृष्टि पर महासंकट आते हैं, तब वे महाकाल स्वयं युगावतार बन कर इन महाविपत्तियों का संहार करते हैं।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१

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