शनिवार, 10 अप्रैल 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

जो कुछ हम देखते, जानते या अनुभव करते हैं—क्या वह सत्य है? इस प्रश्न का मोटा उत्तर हां में ही दिया जा सकता है, क्योंकि जो कुछ सामने है, उसके असत्य होने का कोई कारण नहीं। चूंकि हमें अपने पर, अपनी इन्द्रियों और अनुभूतियों पर विश्वास होता है इसलिए वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में जो समझते हैं, उसे भी सत्य ही मानते हैं। इतने पर भी जब हम गहराई में उतरते हैं तो प्रतीत होता है कि इन्द्रियों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे बहुत अधूरे, अपूर्ण और लगभग असत्य ही होते हैं।

शास्त्रों और मनीषियों ने इसीलिए प्रत्यक्ष इन्द्रियों द्वारा अनुभव किये हुए को ही सत्य न मानने तथा तत्वदृष्टि विकसित करने के लिए कहा है। यदि सीधे सीधे जो देखा जाता व अनुभव किया जाता है उसे ही सत्य मान लिया जाय तो कई बार बड़ी दुःस्थिति बन जाती है। इस सम्बन्ध में मृगमरीचिका का उदाहरण बहुत पुराना है। रेगिस्तानी इलाके या ऊसर क्षेत्र में जमीन का नमक उभर कर ऊपर आ जाता है। रात की चांदनी में वह पानी से भरे तालाब जैसा लगता है। प्यासा मृग अपनी तृषा बुझाने के लिये वहां पहुंचता है और अपनी आंखों के भ्रम पर पछताता हुआ निराश वापस लौटता है। इन्द्र धनुष दीखता तो है पर उसे पकड़ने के लिये लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। जल बिन्दुओं पर सूर्य की किरणों की चमक ही आंखों पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव डालती है और हमें इन्द्र धनुष दिखाई पड़ता है उसका भौतिक अस्तित्व कहीं नहीं होता।

सिनेमा को ही लीजिये। पर्दे पर तस्वीर चलती-फिरती, बोलती, रोती-हंसती दीखती हैं। असम्भव जैसे जादुई दृश्य सामने आते हैं। क्या वह सारा दृश्यमान सत्य है। प्रति सेकेण्ड सोलह की गति से घूमने वाली अलग-अलग तस्वीरें हमारी आंखों की पकड़ परिधि से आगे निकल जाती हैं फलतः दृष्टि भ्रम उत्पन्न हो जाता है। स्थिर तस्वीरें चलती हुई मालूम पड़ती हैं। लाउडस्पीकर से शब्द अलग जगह निकलते हैं और तस्वीरें अलग जगह चलती हैं पर आंख कान इसी धोखे में रहते हैं कि तस्वीरों के मुंह से ही यह उच्चारण या गायन निकल रहे हैं।

प्रातःकालीन ऊषा और सायंकालीन सूर्यास्त के समय आकाश में जो रंग बिरंगा वातावरण छाया रहता है क्या वह यथार्थ है? वस्तुतः वहां कोई रंग नहीं होता यह प्रकाश किरणों के उतार चढ़ाव का दृष्टि संस्थान के साथ आंख मिचौनी ही है। आसमान नीला दीखता है पर वस्तुतः उसका कोई रंग नहीं है। पीला का रंग हो भी कैसे सकता है? आसमान को नीला बता कर हमारी आंखें धोखा खाती हैं और मस्तिष्क को भ्रमित करती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३

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