गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८६)

अन्तर्चक्षु खोल—देगा निद्रा का मर्म

अन्तर्यात्रा का विज्ञान उन समर्पित पथिकों के लिए है, जिन्हें सदा इस बात का बोध रहता है कि उनकी यह अनूठी यात्रा नींद के समय भी चलती रहती है। बल्कि कई बार तो नींद में इस यात्रा की तीव्रता और भी बढ़ जाती है। हालाँकि साधारण तौर पर लोग निद्रा के महत्त्व से अपरिचित ही रहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इन्सान अपनी जिन्दगी का तकरीबन एक तिहाई भाग नींद में ही बिताता है। फिर भी आमतौर पर कोई इसके बारे में न तो सोचता है और न ही ध्यान देता है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि मनुष्य ने चेतन मन की ओर, जाग्रत् दशा की ओर ज्यादा ध्यान लगाया है। जबकि भौतिक पदार्थ की भाँति मन भी त्रिआयामी है। इसका एक आयाम चेतन है, दूसरा अचेतन है और तीसरा अतिचेतन है।
    
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि व्यक्तित्व की पहेली को सुलझाने के लिए, जीवन के महाप्रश्न को हल करने के लिए व्यक्ति को अपनी सम्पूर्णता में प्रतिबद्ध होना होगा। ध्यान सधे, समाधि सिद्ध हो इसके लिए व्यक्ति की समग्र ऊर्जा आवश्यक है। व्यक्ति जब अपने जीवन के सभी आयामों में सम्पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध होगा, केवल तभी अतिचेतन की बादल सदृश घटना में ऊर्ध्वगामी गति सम्भव है। चेतन मन तो सहज क्रियाशील है। इस क्रियाशीलता का अनुभव सभी को सदा किसी न किसी रूप में होता रहता है। अचेतन की अनुभूति गहन भावदशाओं में ही हो पाती है। गहन भावनाओं में जब चेतन नीरव निस्पन्द होता है, तब जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सीधे व्यक्तित्व की जड़ों में पहुँचता है। एक तीसरी सम्भावना अतिचेतन की है, जिसके द्वार शून्यता में खुलते हैं। और इसकी अनुभूति बड़ी विरल दशाओं में विरलों को होती है।

महर्षि अगला सूत्र कहते हैं, अबकी बार की यह राह विचित्र है और अद्भुत भी। परन्तु इस पर चलना नामुमकिन नहीं है।
इस राह के रहस्य को खोलने वाला महर्षि का सूत्र है-
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा॥ १/३८॥
शब्दार्थ-स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनम्= स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का अवलम्बन करने वाला (चित्त); वा= भी (स्थिर हो सकता है)।
अर्थात् उस बोध पर भी ध्यान करो, जो स्वप्न और निद्रा के समय उतर आता है।
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र उनकी योगजन्य रहस्यमयता का बड़ा सुस्पष्ट प्रमाण है। इसमें स्वप्न और निद्रा की भारी आध्यात्मिक उपयोगिता के संकेत हैं। इन संकेतों को जिसने समझ लिया, वह अपने व्यक्तित्व की बिखरी कड़ियों को एक सूत्र में पिरो सकता है। उन्हें सूत्रबद्ध, संगठित एवं सशक्त बना सकता है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि साधक की निद्रा सामान्य जनों की नींद से अलग होती है। उसके स्वप्न भी साधारण लोगों से अलग होते हैं। इन पर ध्यान दिया जाय, तो बोध की अनूठी सम्पदा हासिल की जा सकती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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