रविवार, 6 सितंबर 2020

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग ३)

मैं अकेला नहीं हम सब

इस तथ्य को भगवान बुद्ध जानते थे। इसलिए उन्होंने अपना कार्यक्रम सुनिश्चित रूप से स्थिर कर लिया था। वे बारबार कहा करते थे कि—‟जब तक एक भी प्राणी इस बन्धन में है तब तक मैं मुक्त नहीं हो सकता। मैं हर बार जन्म लेकर दूसरों को मुक्ति की प्रेरणा दूँगा और जब तक कोई भी जीव भव-बन्धनों में बंधा मिलेगा तब तक उसे छुड़ाने को ही अपना लक्ष बनाये रहूँगा।” सामाजिक जीवन का व्यक्तिगत जीवन से अटूट संबंध है। समाज की उपेक्षा करके एक व्यक्ति यदि अपनी ही भलाई की बात सोचता है तो यह उसकी संकीर्णता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कैसे अध्यात्मवादी कहला सकता है? और कैसे उस संकुचित हृदय वाले तुच्छ व्यक्ति को परमात्मा की महानता को समझने और प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है? परमात्मा दूसरों के लिए ही सब कुछ करने में निरन्तर संलग्न है, फिर उसका सच्चा भक्त अनुदार, स्वार्थी, संकीर्ण एवं केवल अपनी ही बात सोचने तक सीमित कैसे रह सकता है? साधक पर साध्य का कुछ तो प्रभाव पड़ना ही चाहिए। उदार, दानी, सहृदय, उपकारी परमात्मा का भक्त क्या इन गुणों से सर्वथा रहित ही रह जाएगा? क्या वह दूसरों की सेवा और सहायता करके समाज में सज्जनता एवं शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ भी न करके केवल पूजा पाठ में ही बैठा रहेगा?

भगवान का मंदिर तोड़ा न जाय

शरीर भगवान का मन्दिर है। आत्मा का निवास होने से उसकी पवित्रता सब प्रकार अक्षुण्य रखे जाने योग्य है। मंदिर को तोड़-फोड़ डालने वाला व्यक्ति पापी और दुष्ट कहा जाता है। फिर असंयम और अनियमितताओं की कुल्हाड़ी चलाकर शरीर को तोड़-फोड़ डालने वाला मनुष्य भला धर्मात्मा कैसे हो सकता है? मंदिरों का सुधारना, जीर्णोद्धार कराना पुण्य कार्यों में गिना जाता है तो अपने या दूसरों के शरीरों को स्वस्थ एवं सुन्दर बनाना, आत्मा के निवास मंदिर को ठीक करना भी एक धर्म कार्य ही माना जाएगा। हममें से प्रत्येक धर्म प्रेमी और अध्यात्मवादी को ईश्वर उपासना की भाँति ही स्वास्थ्य की समुन्नति की ओर भी रुचि लेनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 35

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