गुरुवार, 24 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३४)

रस्सी की तरह घिस दें—चुनौतियों के पत्थर

अन्तर्यात्रा का विज्ञान जीवन के हर झूठ से जूझ रहे योग साधकों के लिए पथ प्रदीप है। योग साधना की डगर कब किस ओर मुड़ती है, इसके प्रकाश में साफ-साफ समझा जा सकता है। साधकों की राह में आने वाले प्रश्न-कंटकों को हटाने-बीनने की पूरी व्यवस्था इसके उजाले में सम्भव है। इसकी किरणें साधकों के अन्तर्मन के अँधियारे की घुटन और घबराहट को हटाती है। इससे साधकों में अपनी साधना के लिए हिम्मत और हौसला बढ़ता है।
    
चेतना के धरातल पर देखें, तो यह पुस्तक ऐसे हिम्मती साधकों एवं महान् गुरुओं के बीच निरन्तर चलने वाला रहस्यमय वार्तालाप है। महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव स्वयं इस योग कथा के माध्यम से अगणित साधकों की भावनाओं को सुनते हैं और उन्हें अपनी योग अनुभूतियों के अमृत रस का भागीदार बनाते हैं। इस योग कथा के शब्द तो बस उनकी विचार तरंगों के माध्यम भर हैं। इससे अधिक और कुछ भी नहीं।
    
जब साधक के सामने सवाल आता है कि आखिर यह अभ्यास क्या है और इसे करें कैसे? तो महर्षि समाधान करते हुए अगला सूत्र कहते हैं-
        
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः॥ १/१३॥
शब्दार्थ- तत्र= उन दोनों (अभ्यास और वैराग्य) में से, स्थितौ= चित्त की स्थिति में, यत्नः= यत्न करना, अभ्यासः= अभ्यास है। यानि कि इन दोनों में, चित्त की स्थिति में (स्वयं में दृढ़ता से) प्रतिष्ठित होने का प्रयास करना अभ्यास है। अभ्यास की सामान्य महिमा से तो हममें से प्रायः सभी परिचित हैं। छोटे बच्चों और गाँव के किसानों से लेकर विशिष्टों, वरिष्ठों एवं विशेषज्ञों तक इसकी महिमा का गुणगान करते हैं। ग्रामीण जीवन में अभ्यास के बारे में एक कहावत अक्सर सुनी जाती है- करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात है सिल पर परत निसान॥ अर्थात् अभ्यास करते-करते एकदम जड़मति भी सविज्ञ-सुजान हो जाते हैं। कुछ उसी तरह से जैसे निरन्तर रस्सी की रगड़ से पाषाण पर भी निशान पड़ जाते हैं। मनुष्य की सारी क्षमताएँ उसके अभ्यास का ही फल है। यहाँ-तक कि पशु-पक्षी भी अभ्यास के बलबूते ऐसे-ऐसे करतब दिखाने लगते हैं, जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबाने का मन करता है।
    
बाहरी जीवन में, लौकिक जीवन में अभ्यास के ढेरों चमत्कार हम रोज देखते हैं। खुद की निजी जिन्दगी में भी अभ्यास के अनेकों अनुभवों को हमने जब-तब अनुभव किया है। परन्तु यह अभ्यास आन्तरिक जीवन में, आध्यात्मिक जीवन में किस तरह किया जाय, यह बात समझना अभी बाकी है। आध्यात्मिक जीवन में- आन्तरिक प्रयास। एक ऐसी होशपूर्ण कोशिश, जिसका मतलब है कि इससे पहले हम बाहर बढ़ें, हमें भीतर बढ़ना चाहिए। पहले हमें अपने केन्द्र में स्थित होने का प्रयास करना चाहिए। पहले हम अपने केन्द्र में स्थित होकर विचार करें और फिर कुछ दूसरा निर्णय करें। यह इतनी बड़ी रूपान्तरकारी घटना है कि एक बार जब हम अपने भीतर केन्द्रित हो जाते हैं, तो सारी बात ही अलग दिखाई पड़ने लगती है, सारा का सारा परिदृश्य ही बदल जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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