शनिवार, 19 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३०)

जो यादों का धुँधलका साफ हो जाए

जो जग गया, उसमें साधना के लिए तीव्र लगन और गहरा समर्पण उपजेगा ही, वही इस योगकथा के सत्य को समझने के लिए सुपात्र भी हैं। महर्षि पतंजलि केवल सुपात्रों और सत्पात्रों को ही जिन्दगी के रहस्य एवं विभूतियाँ सौंपने के इच्छुक हैं। जो सत्पात्र नहीं है, जिनकी साधना नियमित और सघन नहीं है, वे इस अन्तर्यात्रा विज्ञान के शब्दों कों तो हथिया सकते हैं, पर इनका सत्य उनसे सदा दूर रहेगा। एक महान् वैज्ञानिक की भाँति महर्षि पतंजलि ने अपने अन्तर्यात्रा विज्ञान में ऐसी व्यवस्था कर रखी है। जो अनाधिकारी हैं, वे सदा वंचित रहेंगे। अन्तर्यात्रा विज्ञान का सत्य एक ही है, अधिकारी बनें और प्राप्त करें।
  
यह योगकथा आपको श्रेष्ठतम अधिकारी बनाने के लिए ही है। अपने जीवन को रूपान्तरित करके आप वह पा सकते हैं, जो महर्षि पतंजलि आपको सौंपने के लिए इच्छुक हैं, परम पूज्य गुरुदेव ने जिसे खास आपको देने के लिए सम्हाल कर रखा हुआ है। महर्षि कहते हैं कि वृत्तियों के फेर में हमारा जीवन भले ही कितना ही क्लिष्ट क्यों न हो, पर यह योग विधि से अक्लिष्ट या सुखकर हो सकता है। इसी क्रम में महर्षि पाँचवी और अन्तिम वृत्ति के रहस्य को उजागर करते हैं ः-
  
अनुभूतविषया सम्प्रमोषः स्मृतिः॥ १/११॥
  
शब्दार्थ- अनुभूत= अनुभव किए हुए, जाने हुए; विषय= (किसी) विषय का; असम्प्रमोषः = जो खोया हुआ न हो- यानि कि चित्त में संग्रहित हो, उसका ज्ञान होना; स्मृतिः= स्मृति है। संक्षेप में, किन्तु स्पष्ट स्वरों में- स्मृति पिछले अनुभवों को स्मरण करना है।
  
मन की इस पाँचवी वृत्ति के रूप में स्मृति की शक्ति का थोड़ा-बहुत अनुभव हममें से प्रायः सभी को है। बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक सभी अपनी-अपनी स्मृति का उपयोग करते रहते हैं। विद्यार्थियों के लिए तो यह स्मृति क्षमता वरदान ही है। इसी आधार पर उन्हें श्रेष्ठता का गौरव मिलता है। स्मृति के निरन्तर और अविराम उपयोग के बावजूद इसके गहन रहस्यों के बारे में बहुसंख्यक जन अनजान ही हैं। ज्यादातर लोगों के लिए तो  बस यह स्मृति कभी दुःख देती है, तो कभी सुख। कभी वे इस वृत्ति के क्लिष्ट रूप का अनुभव करते हैं, तो कभी अक्लिष्ट रूप का अहसास करते हैं। यादों के झोंके कभी तो उन्हें रुला जाते हैं, तो कभी अचानक इनका स्पर्श उन्हें हँसा देता है। स्मृति के इन्हीं रूपों एवं पर्यायों से हम परिचित हैं। पर क्या सत्य इतना ही है?

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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