गुरुवार, 20 अगस्त 2020

👉 सुख दुःख में समस्वरता

लाभ की तरह हानि का, संयोग की तरह वियोग का, दिन की तरह रात का आना बिलकुल स्वाभाविक है। कपड़े के ताने−बाने की तरह यह जीवन भी सुख और दुख, उतार और चढ़ाव के ताने−बाने से बुना हुआ है। यहाँ बुरा और भला सब कुछ है। बुरा इसलिए है कि उसमें सुधारने का प्रयत्न करते हुए हम अपने को अधिक पुरुषार्थी अधिक पुण्यवान बनावें, शुभ इसलिए है कि उसे देखकर हम प्रमुदित हों और उस उपलब्धि का वितरण दूसरों को भी करें। दोनों ही प्रकार की—भली और बुरी परिस्थितियों से हँसते−खेलते भी निपटा जा सकता है तो फिर रोते कलपते उनसे क्यों निपटें?

ताश खेलने में बाजी हार जाने पर, खेल खेलते हुए परास्त हो जाने पर, नाटक करते हुए आपत्तिग्रस्त हो जाने पर कौन रोता कलपता है? उस हानि को हलके मन से, उपेक्षा भाव से देखने पर उसका प्रभाव मन पर जरा−सी देर हलका−सा रहता है और फिर हम अपना आगे का काम स्वस्थ चित्त से करने लगते हैं। यदि हमारा मन विवेकी हो तो शोक, वियोग, हानि, कष्ट, परेशानी, दुर्व्यवहार आदि के अप्रिय प्रसंगों को हँसकर सहन कर सकते हैं, और फिर सन्तुलित मन को उन समस्याओं का हल खोजने में लगाकर आगत कठिनाई से पार होने का मार्ग भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। मन की स्वच्छता से विवेक जागृत होता है, सोचने का सही तरीका अभ्यास में आता है और तब प्रायः सभी उलझी हुई समस्यायें शान्तिपूर्वक सुलझ जाती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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