मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

👉 सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा

श्रद्धा अर्थात् श्रेष्ठता से असीम प्यार, अटूट अपनत्व। सजलता - तरलता इसकी विशेषता है। पानी पर कितने भी प्रहार कि ए जाएँ, वह कटता - टूटता नहीं है। पानी से टकराने वाला उसे तोड़ नहीं पाता, उसी में समा जाता है। श्रद्धा की यही विशेषता उसे अमोघ प्रभाव वाली बना देती है।
  
प्रज्ञा अर्थात् जानने, समझने, अनुभव करनें की उत्कृष्ठ क्षमता, दूरदर्शी विवेकशीलता। प्रखरता इसकी विशेषता है। प्रखरता की गति अबाध होती है। प्रखरता युक्त प्रज्ञा हजार अवरोधों - भ्रमों को चीरती हुई यथार्थ तक पहुँचने एवं बुद्धि के उत्कृष्ठतम नियोजन में सफ ल होती है।
  
सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा तीर्थ के सनातन मूल घटक हैं। जहाँ ऋषियों अवतारी सत्ताओं के प्रभाव से यह दोनों धाराऐं सघन सबल हो जाती हैं वहीं तीर्थ विकसित - प्रतिष्ठित हो जाते हैं। युगतीर्थ - गायत्री तीर्थ के भी यही मूल घटक हैं।
  
युगतीर्थ के संस्थापक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं स्नेह सलिला वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा की वास्तविक पहचान उनके शरीर नहीं, उनके द्वारा प्रवाहित प्रखर प्रज्ञा एवं सजल श्रद्धा की सशक्त धाराएँ रही हैं। इसलिए उनके स्मृति चिन्हों के रूप में उनकी स्थूल काया की मूर्तियाँ नहीं, उनके सूक्ष्म तात्विक प्रतीकों के रूप में उन स्मृति चिन्हों को स्थापित किया गया है। वेजीवन भर दो शरीर एक प्राण रहे, इसलिये उनके शरीर का अन्तिम संस्कार एक ही स्थान पर, उनके तात्विक प्रतीकों के समीप संपन्न कर उसी स्थल को उनके संयुक्त समाधि स्थल का रूप दे दिया गया है। तीर्थ चेतना के इन प्रतीकों पर अपनी श्रद्धा समर्पित करके सत्प्रयोजनों के लिये उनसे शक्ति, अनुदान, आशीर्वाद सभी श्रद्धालु प्राप्त कर सकते हैं।

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