गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

👉 प्रभु की माया

जो जानता है कि मैं नहीं जानता, पर कहता है कि मैं जानता हूँ, वह झूठा है। जो जानता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं जानता हूँ, वह वास्तव में नहीं जानता है, कारण कि पूर्णरूपेण जानना वास्तव में असंभव ही है।

जो जानता है कि मैं नहीं जानता और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह सत्य कहता है। जो जनता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह कुछ जानता है, पर है वह अधूरा ही। यह भी प्रभु की माया है।

जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता और यही कहता भी है, वह औरों से अधिक जानता है, परंतु जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता, इसी कारण चुप रहता है, किसी से कुछ नहीं कहता, वह वास्तव में बहुत जानता है। इतना जानकर भी जो प्रभु के प्रेम में सब कुछ भूल जाता है, वह प्रभु में लय हो जाता है। वह धन्य है।

वही पूर्णतया जानता है, जो जानकर भी भूल गया है, जो भक्त है, अनन्य प्रेमी है। वह अब क्या बताए? उसके पास बताने की कोई बात ही नहीं है, उसके द्वंद्व मिट चुके हैं। अब कौन बताए और किसे बताए, बताने को धरा ही क्या है? यही प्रभु की माया है। उसकी माया वही जाने। प्रभु की महिमा अपरंपार है।

📖 अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941

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