बुधवार, 18 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६७)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा की प्रथम कक्षा- रेकी

प्राण चिकित्सा की इस रेकी प्रक्रिया में अन्तरिक्ष में संव्याप्त प्राणशक्ति का उपयोग किया जाता है। यह सच तो हम जानते हैं कि प्राण ऊर्जा अन्तरिक्ष में व्याप्त है। पृथ्वी के लिए इसका मुख्य स्रोत सूर्य है। सूर्य से अलग- अलग तरह की तापीय एवं विद्युत चुम्बकीय तरंगे निकलकर धरती पर अलग असर डालती हैं। ठीक इसी तरह प्राण शक्ति भी एक जैव वैद्युतीय तरंग है। जो धरती में सभी जड़ चेतन एवं प्राणी- वनस्पतियों में प्रवाहित होती है। इसी की उपस्थिति के कारण सभी क्रियाशील व गतिशील होते हैं। इसी वजह से धरती में उर्वरता आती है और वनस्पतियाँ तथा जीव- जगत् स्वस्थ व समृद्ध बने रहते हैं। यह सभी कुछ प्राण शक्ति का चमत्कार है। मनुष्य भी अपनी आवश्यकतानुसार इसी प्राण शक्ति को ग्रहण करता है। इसमें अवरोध व रुकावट से ही बीमारियाँ पनपती हैं। रेकी चिकित्सा के द्वारा इस रुकावट को दूर करने के साथ व्यक्ति के अतिरिक्त प्राण शक्ति दी जाती है। इस प्राण शक्ति को ग्रहण कर वह व्यक्ति फिर से अपना खोया हुआ स्वास्थ्य पा सकता है।

प्राण चिकित्सा की इस विधि से न केवल मनुष्य, बल्कि पशुओं का भी उपचार किया जा सकता है। वनस्पतियों की भी प्राण ऊर्जा बढ़ायी जा सकती है। भारतवर्ष में इन दिनों रेकी विधि का प्रचलन बढ़ चुका है। प्रत्येक शहर में कहीं न कहीं रेकी मास्टर मिल जाते हैं। इनसे मिलने वालों के अपने- अपने अलग- अलग अनुभव हैं। इनमें से कई अपने परिजन भी हैं। इनकी अनुभूतियाँ बताती हैं कि गायत्री साधना करने वाला अधिक समर्थ रेकी चिकित्सक हो सकता है। इसका कारण यह है कि रेकी में ली जाने वाली प्राण ऊर्जा का स्रोत सूर्य है। वही यहाँ गायत्री मंत्र का आराध्य देवता है। गायत्री साधना में साधक की भावनाएँ स्वतः ही सूर्य पर एकाग्र हो जाती हैं और उसे अपने आप ही प्राण ऊर्जा के अनुदान मिलने लगते हैं।

गायत्री साधना के साथ रेकी को जोड़ने पर एक अन्य लाभ भी देखने को मिला है। और वह यह है कि गायत्री साधक के सभी चक्र या शक्तिकेन्द्र स्व गतिशील हो जाते हैं। उसे किसी अतिरिक्त विधि की आवश्यकता नहीं पड़ती। चक्रों के सम्बन्ध में यहाँ एक बात जान लेना चाहिए, क्योंकि अधिकाँश रेकी देने वाले इस बारे में भ्रमित देखे जाते हैं। रेकी विधि में चक्रों को केवल क्रियाशील बनाने की बात है, न कि इनके सम्पूर्ण रूप से जागरण का। क्रियाशील होने का मतलब है कि हमें आवश्यक प्राण ऊर्जा ब्रह्माण्ड से मिलती रहे। इस प्रक्रिया में जो अवरोध आ रहे हैं वे दूर हो जायें। जबकि योग विधि जागरण होने पर योग साधक का सम्बन्ध चक्रों से सम्बन्धित चेतना के अन्य आयामों से हो जाता है और उसमें अनेकों रहस्यमयी शक्तियाँ प्रवाहित होने लगती हैं। प्राण चिकित्सा के रूप में रेकी आध्यात्मिक चिकित्सा की प्राथमिक कला है। इसमें गायत्री साधना के योग से इसकी उच्चस्तरीय कक्षाओं में स्वतः प्रवेश हो जाता है। इस सम्बन्ध में विशिष्ट शक्ति व सामर्थ्य अर्जित करने के लिए नवरात्रि काल को उपयुक्त माना गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९३

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