शनिवार, 14 सितंबर 2019

👉 संसार में चार प्रकार के लोग देखे जाते हैं।

एक - जो कोरे नास्तिक हैं, वे स्पष्ट मना करते हैं, कि ईश्वर नहीं है। 

दूसरे - वे लोग जो आस्तिक तो हैं, ईश्वर को मानते तो हैं, परंतु ईश्वर का स्वरूप ठीक नहीं समझते। वे वृक्षों में और मूर्तियों में और फोटो में और पता नहीं कहां-कहां ईश्वर की पूजा करते रहते हैं। 

तीसरे -  वे लोग हैं जो ईश्वर को शब्दों से तो ठीक जानते मानते हैं, परंतु उसके अनुसार आचरण नहीं कर पाते। जैसे कि वे कहते हैं, ईश्वर न्यायकारी है, हमारे पापों का दंड माफ नहीं करेगा। फिर भी वो कहीं ना कहीं पाप कर लेते हैं। 

और चौथे - प्रकार के व्यक्ति वे हैं, जो ईश्वर को ठीक तरह से जानते भी हैं, मानते भी हैं, और आचरण भी वैसा ही करते हैं। अर्थात वे पाप नहीं करते।

सच्चे पूर्ण आस्तिक तो यही हैं, चौथे वाले।
यदि आप पहले वर्ग में हैं, अर्थात नास्तिक हैं, तो भी आप ईश्वर से लाभ नहीं उठा पाएंगे।
यदि आप दूसरे वर्ग में हैं, तो भी आप भटकते रहेंगे। आपके पाप नहीं छूटेंगे। और ईश्वर से लाभ नहीं ले पाएंगे। यदि आप तीसरे वर्ग में हैं, तो भी पाप बंद नहीं होंगे, क्योंकि आपका शाब्दिक ज्ञान ठीक होते हुए भी आचरण ठीक नहीं है, और आपको उसका दंड भोगना पड़ेगा।

इसलिए चौथे वर्ग में आना चाहिए। सच्चा आचरणशील आस्तिक बनना चाहिए। जिससे आपका वर्तमान जीवन भी अच्छा बने और आपका भविष्य भी स्वर्णिम हो, सुखदायक हो।

स्वामी विवेकानंद

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