शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६८)

👉 वातावरण की दिव्य आध्यात्किम प्रेरणाएँ

आध्यात्मिक वातावरण में रहने से व्यक्ति के तन, मन व जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा स्वतः होती रहती है। बस यहाँ रहने वाले व्यक्ति ग्रहणशील भर हों। अन्यथा उनकी स्थिति गंगा जल में रहने वाले मछली, कछुओं जैसी बनी रहती है। वे गंगाजल का भौतिक लाभ तो उठाते हैं, पर उनकी चेतना इसके आध्यात्मिक संवेदनों से संवेदित नहीं होती। इसके विपरीत गंगा किनारे रहने वाले, गंगा- जल से पूजा अर्चना करने वाले तपस्वी, योगी पल- पल शरीर के साथ अपने अन्तर्मन को भी इससे धुलते रहते हैं। उनमें आध्यात्मिक जीवन की ज्योति निखरती रहती है। श्रद्धा और संस्कार हों, विचार व भावनाएँ संवेदनशील हों तो आध्यात्मिक वातावरण का सान्निध्य जीवन में चमत्कार पैदा किए बिना नहीं रहता।

बरसात हो तो मैदान हरियाली से भर जाते हैं। हवा का रूख सही हो तो नाविक की यात्रा सुगम हो जाती है। यही स्थिति वातावरण की वैचारिक एवं भावनात्मक ऊर्जा के बारे में है। यदि यह ऊर्जा प्रेरक व सकारात्मक है तो वहाँ रहने वालों के मन स्वयं ही खुशियों से भरे रहते हैं। अन्तर्मन में नयी- नयी प्रेरणाओं का प्रवाह उमगता रहता है। जीवन सही दिशा में गतिशील रहता है और उसकी दशा संवरती- निखरती रहती है। इसके विपरीत स्थिति होने पर मन में विषाद व अवसाद के चक्रव्यूह पनपते हैं। प्राणशक्ति स्वयं ही क्षीण होती रहती है। जीवन को अनेकों आधियाँ- व्याधियाँ घेरे रहती हैं। इस सत्य को वे सभी अनुभव करते हैं, जिन्हें वातावरण की सूक्ष्मता का ज्ञान है।

प्रत्येक स्थान स्थूल, सूक्ष्म व कारण तत्त्वों के क्रमिक आवरण से घिरा होता है। इनमें स्थूल तत्त्व जो सभी को खुली आँखों से दिखाई देते हैं, परिवेश की सृष्टि करते हैं। आस- पास की स्थिति, बिल्डिंग- इमारतें, स्कूल- संस्थाएँ, वहाँ रहने वाले लोग इसी से परिवेश का परिचय मिलता है। इस स्थूल आवरण के अलावा प्रत्येक स्थान में पर्यावरण का सूक्ष्म आवरण भी होता है। यह स्थिति पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु व आकाश के समन्वय व सन्तुलन पर निर्भर करती है। इस समन्वय व सन्तुलन की स्थिति कितनी संवरी या बिगड़ी है। इसी के सत्प्रभाव या दुष्प्रभाव उस स्थान पर दिखाई देते हैं। पर्यावरण यदि असन्तुलित है, तो वहाँ अनायास ही शारीरिक बीमारियाँ, मनोरोग पनपते रहते हैं। सभी जानते हैं कि इन दिनों विशिष्टों, वरिष्ठों व विशेषज्ञों के साथ सामान्य जनों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है और वे इसके प्रभावों को अनुभव करने लगे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९५

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