शनिवार, 21 सितंबर 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Sep 2019

★ सब कर्मों से निवृत होकर जब निद्रा देवी की गोद में जाने की घडी आये, तब कल्पना करनी चाहिए कि एक सुन्दर नाटक का अब पटाक्षेप हो चला। यह संसार एक नाट्यशाला है। आज का दिन अपने को अभिनय करने के लिए मिला था, सो उसको अच्छी तरह खेलने का ईमानदारी से प्रयत्न किया। जो भूलें रह गई उन्हें याद रखने और अगले दिन उसकी पुनरावृत्ति न होने देने की अधिक सावधानी बरतेंगे।
 
□  श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्रति के लिए बनाये गए मार्ग को दिखाता रहत है। जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है तो माता की ठण्डे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है। सत्य के सद्गुण, ऐश्वर्यस्वरुप एवं ज्ञान की थाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है, उसी को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा सत्य की सीमा तक साधक को साधे रहती है, संभाले रहती है।
 
◆ जीवन को किसी निर्दिष्ट ढाँचे में ढाल देने वाली, सबसे प्रबल एवं उच्चस्तरीय शक्ति श्रद्धा है। यह अन्त:करण की दिव्यभूमि में उत्पन्न होकर समस्त जीवन को हरियाली से सजा देती है। श्रद्धा का अर्थ है श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था। वह आस्था जब सिद्धान्त एवं व्यवहार में उतरती है तो उसे निष्ठा कहते हैं। यही जब आत्मा के स्वरुप, जीवन दर्शन एवं ईश्वर भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो श्रद्धा कहलाती है।

◇ जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए सबसे प्रथम अनिवार्य रुप से आत्म-निरीक्षण और आत्म सुधार ही करना पड़ता है । भगवान का नाम स्मरण करने, जप-तप, पूजा-पाठ के अनुष्ठान करने का उद्देश्य यही है कि मनुष्य भगवान को सर्वव्यापी एवं न्यायकारी होने की मान्यता को अधिक गहराई तक हृदय में जमा ले ताकि दुष्कर्मों से डरे और सत्कर्मों में रुचि ले।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

1 टिप्पणी:

किदार नाथ शर्मा ने कहा…

अति सुन्दर। जय माँ गायत्री ।

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