शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Sep 2019

★ यह सांसारिक जीवन सत्य नहीं है। सत्य तो परमात्मा है, हमारे अन्दर बैठी हुई साक्षात ईश्वर स्वरुप आत्मा है, वास्तविक उन्नति तो आत्मिक उन्नति है। इसी उन्नति की ओर हमारी प्रवृत्ति बढे़, इसी में हमारा सुख-दु:ख हो। यही हमारा लक्ष्य रहा है। अपने हास के इतिहास में भी भारत ने अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने ऊँचे आदर्शों को प्रथम स्थान दिया है।  
 
□  मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि असत्य अच्छा नहीं फिर भी वह उसी में आसक्त रहता है। वह अपने दुर्गुणों को नहीं छोड़ सकता। वह अपने दुर्गुणों को नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील नहीं होता। इसका कारण क्या है? अविद्या रहस्यमयी है। बुरे संस्कारों के कार्य रहस्यमय है। सत्संग तथा गुरुसेवा के द्वारा इस मोह को नष्ट किया जा सकता है।
 
◆ सभ्यता का आचरण वह प्रणाली है जिससे मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करता है। कर्तव्यपालन करने का तात्पर्य है नीति का पालन करने का अर्थ है अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखना। ऐसा करने से हम अपने आपको पहिचानते हैं। यही सभ्यता है और इससे विरुद्ध आचरण करना असभ्यता है।

◇ हम भले ही अपने दुष्कर्मों को भूल जायें, पर "कर्म" छोटे से छोटे और बुरे से बुरे किसी भी कार्य को नहीं भूलता और समय पर उसका अवश्य भोगवाता है। इसलिए यदि इस तथ्य को हम समझकर ग्रहण करें तो अनेक बुरे कार्य हम से आप छूट जायेंगे और इस प्रकार जीवन बहुत सुधर जायेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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