मंगलवार, 27 अगस्त 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Aug 2019

■  ज्ञान वृद्धि और आत्मोत्कर्ष के लिए अच्छे साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है पर उनका केवल पढ़ना मात्र काफी नहीं है उस पर मनन तथा विचार भी होना चाहिये। विचार में बडी शक्ति है। सद्विचारों का प्रभाव तो मन में सदा ही चलता रहना चाहिए। विचार जब परिपक्व होकर परिपक्वावस्था पर पहुँच जावेंगा तभी तो वह आचरण का रुप धारण करेगा।
 
◇ संसार का अनियन्ता का अभ्यास अहंकार का विनाशक है। जिस व्यक्ति का अहंकार जितना अधिक होता है उसके दु:ख भी उतने अधिक होते है। अहंकार की वृद्धि एक प्रकार का पागलपन है। अहंकारी मनुष्य दुराग्रही होता है। वह जिस बात को सच मान बैठता है उसके प्रतिकूल किसी की कुछ भी सुनने को तैयार नहीं रहता और जो उसका विरोध करता है वह उसका घोर शत्रु हो जाता है। 

★ विचार एक महान शक्ति है "जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे।" सोचो कि आप शक्तिहीन हैं, आप शक्तिहीन हो जायेंगे। अपने को मूर्ख समझो, सचमुच आप मुर्ख हो जायेगे। ध्यान करो कि आप स्वयं परमात्मा हो, यथार्थ में आप परमात्मा का रुप प्राप्त कर लोगे। प्रतिपक्ष-भावना का अभ्यास करो। क्रोध की हालत में प्रेम की भावना करो। निराशा में मन को आनन्द और उत्साह से भरो।

◇ हमारे जीवन का उद्देश्य भगवतप्राप्त या मुक्ति है। परमेश्वर बीजरुप से हमारे अन्तरात्मा में स्थित हैं। हृदय को राग, द्वेष आदि मानसिक शत्रुओं, सांसारिक प्रवंचों व्यर्थ के वितण्डवाद, उद्वेराकारक बातों से बचाकर ईश्वर-चिन्तन में लगाना चाहिये। दैनिक जीवन का उत्तरदायित्व पूर्ण करने के उपरान्त भी हममें से प्राय: सभी ईश्वर को प्राप्त कर ब्रह्मानन्द लूट सकते है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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