गुरुवार, 22 अगस्त 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Aug 2019

■  मनुष्य के व्यक्तित्व का मुल्यांकन करते समय उसकी आदतों को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। जिस मनुष्य की जैसी आदतें है, जैसा स्वभाव है, वैसा ही उसका मूल्यांकन किया जाता है। विद्या, बुद्धि, चतुरता, रौव दौव आदि का भी मनुष्य जीवन में अपना स्थान है परन्तु उन सबसे ऊपर मनुष्य का रहन सहन का तरीका, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं कार्य करने की गति विधि ही है।
 
◇ जो मनुष्य आत्म कल्याण चाहता है उसे नि:स्वार्थ भाव से ही दूसरों के प्रति उदारता दिखाना और उनकी सेवा करना आवश्यक होता है। इस प्रकार के कार्य से उसे कोई लौकिक लाभ हो या नहीं उसे आध्यात्मिक लाभ अवश्य होता है  उसके उदार विचारों की संख्या बढ़ जाती है और ये उदार विचार उसे आपत्ति काल मे काम देते हैं । उदार विचार रोग से बचाते हैं और सहज में ही आरोग्य बना देते हैं।  

★ मानव-जाति ने जो भूलें की हैं, उनके लिए दण्ड का जब विधान होता है, तब विधान होता है, तब कोई भी उसे बचा नहीं सकता। इसीलिये  हमारे पूर्वज कहा करते थे कि मनुष्य को हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिये। अगर अच्छे काम किये जायेंगे, तो उनका फल भी अच्छा ही होगा। अगर तुम किसी को हानि नहीं पहुँचाओगे तो कोई भी तुम्हारी हानि नहीं कर सकता।

◇ अपने आप को ऊपर उठाना और गिराना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। साहस, उत्साह, पराक्रम और विश्वास के आधार पर मनुष्य ऊँचा उठता है। यह उसका उत्कर्षजन्य प्रयास है। इसके विपरीत यदि कोई हीनता की भावनाओं से ग्रसित हो, भय, निराशा, उद्विग्नता, अविश्वास, आशंका से घिरा रहे तो उसका भौतिक एवं आत्मिक पतन होता चलता है। साधन और अवसर सामने होने पर भी उसे अधोगामी मार्ग ही पकड़ना पड़ता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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