मंगलवार, 20 अगस्त 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Aug 2019

■  नम्रता, नैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की वह भावना है, जो सब मनुष्यों में, सब प्राणियों में, स्थित शाश्वत सत्य से ईश्वर से सम्बन्ध कराती है। इस तरह उसे जीवन के ठीक-ठीक लक्ष्य की प्राप्ति कराती है। जगत में उस शाश्वत चेतना का, ईश्वर का दर्शन कर, मनुष्य का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है।
"सियाराम मय सब जग जानी,
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।"
 
◇ अन्त:करण को बलवान बनाने का उपाय यह है कि आप कभी उसकी अवहेलना न करें। वह जो कहे, उसे सुनें और कार्यरुप में परिणत करें। किसी कार्य को करने से पूर्व अपनी अन्तरात्मा की गवाही अवश्य लें। यदि प्रत्येक कार्य में आप अन्तरात्मा की सम्मति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक पथ नष्ट न होगा। दुनियाँ भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अन्तरात्मा का पालन कर सकें, तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।  

★ आत्म चिन्तन से नवशक्ति एवं विश्राम मिलता है, आनेवाली आवश्यकताओं के लिए शक्ति रक्षित होती है, और जीवन को संतुलित और लचीला बनाये रखने में सहायता मिलती है। इसके द्वारा हम बहुधा अपने अच्छे बुरे कर्मों पर पुनर्विचार कर सकते है। इस क्रिया से आन्तरिक विकास में बडी सहायता मिलती है।

◇ सदा कार्य में व्यस्त रहना, टांगे-घोडे की तरह सदा काम में जुते रहना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत हानि-कारक होता है। इस पर भी हममें से अधिकतर मनुष्य अपने अवकाश के समय का उपयोग केवल दो ही रीतियों से करने का विचार कर सकते हैं या तो हम केवल काम करते हैं या केवल खेल में ही समय बिता देते हैं। हममें से बहुत कम लोग यह विचार करते हैं कि दैनन्दिन जीवन में आने वाले विरामों का एक दूसरा बहुमूल्य उपयोग भी है वह है- आत्म चिन्तन।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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