शनिवार, 20 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 32)

यही है आज के युग का सच। ऐसे आडम्बर से भरे एवं घिरे आध्यात्मिक चिकित्सकों की इस समय बाढ़ आयी हुई है। टी.वी. में प्रचार, अखबारों में विज्ञापन, लच्छेदार प्रवचन, बात- बात में अपनी प्रशंसा, ऐसे लोग और कुछ भले हों, आध्यात्मिक चिकित्सक कभी नहीं हो सकते। क्योंकि इसके लिए बौद्धिक चतुराई या चालाकी नहीं कठिन तप साधनाएँ चाहिए। वेष नहीं आचरण चाहिए। लुभावनी वाणी की बजाय उदार हृदय चाहिए। दिखावे और आडम्बर से यहाँ कोई काम चलने वाला नहीं है। ऐसे लोग भोले- भाले पीड़ित जनों को ठगकर खुद माला- माल तो हो सकते हैं, पर उनका कोई भी हित साधन नहीं कर सकते। इस तरह के धूर्तों के चंगुल में फंसने वाले स्वास्थ्य लाभ करने के स्थान पर दुःख, दारिद्रय, विपन्नता व विषाद ही हासिल करते हैं।

आध्यात्मिक चिकित्सक के लिए तो कठोर तपकर्म ही उनके जीवन की परिभाषा होता है। शरीर, मन और वचन से ये कभी भी तप साधना से नहीं डिगते। इनका जीवन अपने आप में उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगशाला होता है। जिसमें कठिन आध्यात्मिक प्रयोगों की शृंखला हमेशा चलती रहती है। इनके रोम- रोम में आध्यात्मिक ऊर्जा की सरिताएँ उफनती है। इनका व्यक्तित्व आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुञ्ज होता है। जिनके अन्दर ऐसी योग्यता होती है, वही आध्यात्मिक चिकित्सक होने के लिए सुपात्र- सत्पात्र होते हैं।
आध्यात्म विद्या- अस्तित्व के समग्र बोध का विज्ञान है। जो इसमें निष्णात हैं, उनकी दृष्टि पारदर्शी होती है।

वे व्यक्तित्व की सूक्ष्मताओं, गहनताओं व गुह्यताओं को समझने में सक्षम होते हैं। उनके लिए किसी के अन्तर में प्रविष्ट होना उसकी समस्याओं को जान लेना बेहद आसान होता है। वे औरों को उसी तरह से देखने में समर्थ होते हैं- जैसे हम सब किसी शीशे की अलमारी में बन्द सामान को देखते हैं। यह सामान क्या है? किस तरह से रखा है? पारदर्शी शीशे से साफ- साफ नजर आता है। कुछ इसी तरह से आध्यात्मिक चिकित्सक को अपने रोगी के रहस्य नजर आते हैं। उसके लिए जितना प्रत्यक्ष व्यवहार होता है, उतने ही प्रत्यक्ष संस्कार होते हैं। वह जितनी आसानी से वर्तमान जीवन को जान सकता है, उतनी आसानी से पूर्वजन्मों को भी निहार सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 47

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