सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

👉 देश के युवकों

"मेरी समस्त भावी आशा उन युवकों में केंद्रित है, जो चरित्रवान हों, बुद्धिमान हों, लोकसेवा हेतु सर्वत्यागी और आज्ञापालक हों, जो मेरे विचारों को क्रियान्वित करने के लिए और इस प्रकार अपने तथा देश के व्यापक कल्याण के हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर सकें!...

यदि मुझे नचिकेता की श्रद्धा से संपन्न केवल दस या बारह युवक मिल जाएँ तो मैं देश के विचारों और कार्यों को एक नई दिशा में मोड़ सकता हूँ! ईश्वरीय इच्छा से इन्हीं युवकों में से कुछ समय बाद आध्यात्मिक और कर्मशक्ति के महान पुंज उदित होंगे, जो भविष्य में मेरे विचारों को कार्यान्वित करेंगे !

युवकों को एकत्र और संगठित करो ! महान त्याग के द्वारा ही महान कार्य सम्भव है! मेरे वी , श्रेष्ठ, उदात्त बंधुओं! अपने कंधों को कार्यचक्र में लगा दो, कार्यचक्र पर जुट जाओ! मत ठहरो, पीछे मत देखो न नाम के लिए न यश के लिए! व्यक्तिगत अह्मान्यता को एक ओर फेंक दो और कार्य करो! स्मरण रखो कि घास के अनेक तिनकों को जोड़कर जो रस्सी बनती है, उससे एक उन्मत्त हाथी को बाँधा जा सकता है!

ओ वीर आत्माओं! आगे बढ़ो, उन्हें मुक्त कराने के लिए जो जंजीरों में जकड़े हुए हैं, उनका बोझ हल्का कराने के लिए जो दुःख के भार से लदे हैं, उन हृदयों को आलोकित करने के लिए, जो अज्ञान के गहन अंधकार में डूबे हुए हैं!
सुनों वेदान्त डंके की चोट पर घोषणा कर रहा है...

'अभी' (निर्भय बनो) ! ईश्वर करे यह पवित्र स्वर धरती के समस्त प्राणियों के हृदयों की ग्रंथियाँ खोलने में समर्थ हो!"

~ स्वामी विवेकानंद

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