गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

👉 सद्गुरु का स्मरण

🔷 राजगृह नगर प्रायः भगवान् तथागत के श्री चरणों के स्पर्श से पावन होता रहता था। नगरवासियों में भगवान् के प्रति सहज प्रीति थी। वे सब उठते, बैठते एक-दूसरे से मिलने पर ‘नमो बुद्धस्स’ कहकर तथागत का स्मरण कर लेते थे। इस नगर में दो बालकों की मित्रता बड़ी चर्चित थी। सुवीर और सुयश यही नाम थे उनके। किशोरवय के ये दोनों बालक भाँति-भाँति के खेल-खेला करते। अचरज की बात यह थी सुयश हमेशा जीतता था और सुवीर हमेशा हार जाता। इसमें सबसे अचरज तो इस बात का था कि जो सदा जीतता था, वह हारने वाले से सभी दृष्टियों से कमजोर था।

🔶 सुवीर ने अपने जीतने के लिए सभी उपाय किये। खेलने का ज्यादा अभ्यास किया, परन्तु सफलता न मिली। लेकिन परिणाम पहले की ही भाँति बना रहा। सुवीर को इस बात की भारी चिन्ता था कि आखिरकार सुयश के लगातार जीतने का कारण क्या है? हाँ एक बात सुयश में बड़े ही साफ तौर पर नजर आती थी, कि वह आश्चर्यजनक ढंग से शान्त रहता था। उसमें जीत के लिए कभी कोई आतुरता नहीं झलकती थी। उसमें जीतने के लिए कभी कोई आग्रह नहीं था। वह बस खेलता था, सम्पूर्ण मनोयोग से किन्तु अनाग्रह से।

🔷 कोई फलाकाँक्षा नहीं थी उसमें। इसे देखकर ऐसा लगता था, जैसे वह अपने आप में केन्द्रित है, स्वयं में ठहरा हुआ है। उसमें एक अनोखी गहराई थी। वह ओछा नहीं था, न ही उसमें कोई छिछलापन था। उसके अंतस् में जैसे कोई लौ निष्कम्प जलती थी। उसके चारों ओर एक प्रसादपूर्ण प्रभामण्डल था। शायद इसीलिए बार-बार हारने पर भी सुवीर उसका शत्रु न बन पाया था। उसकी मित्रता कायम थी। सुयश चाहे जितनी बार जीतता, परन्तु उसमें कभी कोई अहंता न आती थी। जीतना जैसे उसके लिए कुछ खास था ही नहीं। खेलना ही उसके लिए सब कुछ था, फिर जीतें या हारें, इससे उसको कोई प्रयोजन नहीं था। फिर भी वह जीतता था।

🔶 सुवीर, सुयश के प्रत्येक व्यवहार को बारीकी से देखता था। इस क्रम में उसने देखा कि सुयश प्रत्येक खेल शुरू करने से पहले आँख बन्द करके एक क्षण को निस्तब्ध हो जाता था। कुछ इस तरह जैसे कि सारा संसार रुक गया हो। हाँ वह अपने होठों में जरूर कुछ बुदबुदाता था। जैसे कि वह कोई प्रार्थना कर रहा हो या कि फिर कोई मंत्रोच्चार करता हो अथवा अपने ईष्ट का स्मरण कर रहा हो।

🔷 अन्ततः एक दिन सुवीर ने सुयश से यह रहस्य पूछा- प्रिय मित्र, तुम खेल शुरू करने से पहले यह क्या करते हो? हर खेल शुरू होने से पहले तुम किस दुनिया में खो जाते हो। सुयश ने कहा- प्रिय मित्र! मैं तो बस भगवान् का स्मरण करता हूँ। ‘नमो बुद्धस्स’ का पाठ करता हूँ। शायद इसीलिए मैं जीत जाता हूँ। परन्तु मुझे हर बार-हर समय यही लगता है कि यह जीत मेरी नहीं, भगवान् की है। मैं नहीं जीत रहा, भगवान् जीत रहे हैं।

🔶 सुयश की बातें सुनकर उस दिन से सुवीर ने भी नमो बुद्धस्स का पाठ शुरू कर दिया। हालाँकि उसे पहले से कोई अभ्यास नहीं था, फिर भी उसे इसमें धीरे-धीरे रस आने लगा। शुरुआत तो तोता रटन्त से ही हुई थी, पर मंत्रोच्चार के परिणाम मन पर दिखाई देने लगे। गहराई में न सही पर सतह पर इसके स्पष्ट फल दिखाई देने लगे। वह थोड़ा शान्त होने लगा। उसकी उच्छृंखलता कम होने लगी। थोड़ा छिछलापन कम होने लगा। उसकी हार की पीड़ा कम होने लगी। जीतने की महत्त्वाकाँक्षा भी थम सी गयी। खेल बस खेलने के लिए है, ऐसा भाव उसमें जागने लगा।

🔷 भगवान् के स्मरण में वह अनजाने ही अपनी अन्तश्चेतना में डूबने लगा। शुरू तो किया था इसलिए कि खेल में जीत जाऊँ। लेकिन धीरे-धीरे जीत-हार की बात ही बिसर गयी। अब तो बस स्मरण में आनन्द बरसने लगा। पहले तो खेल के शुरू-शुरू में याद करता था, पर बाद में जब कभी एकान्त मिल जाता तो बैठकर नमो-बुद्धस्स-नमो बुद्धस्स का जाप करने लगता। यहाँ तक कि कुछ दिन बीतने पर खेल गौण हो गया और जाप प्रमुख हो गया। एक मिश्री सी उसके मुँह में घुलने लगी। सुवीर बुद्ध स्मरण में विभोर होने लगा। नमो बुद्धस्स का जप करते हुए उसे एक खुला आकाश दिखाई पड़ने लगा। धीरे-धीरे उसकी आकाँक्षाएँ खो गयीं। सब समय एक शान्त धारा उसके भीतर बहने लगी।

🔶 एक दिन वह अपने पिता के साथ लकड़ी काटने के लिए जंगल गया। लौटने पर पिता-पुत्र दोनों ही रास्ते में श्मशान के पास बैलों को खोलकर थोड़ी देर विश्राम के लिए रुके। भरी दोपहरी थी और वे थक गए थे, इसलिए सो गए। जगने पर देखा उनके बैल नगर में चले गए हैं। पिता ने सुवीर से कहा, बेटा! तुम यहीं रुककर गाड़ी और लकड़ी की रखवाली करो, मैं बैलों को लेकर आता हूँ। काफी खोज-बीन करने पर बैल तो मिल गए, पर तब तक सूर्य ढल चुका था। सूर्य ढलने के साथ ही नगर द्वार बन्द हो गया। अमावस की अंधेरी रात, इकलौता पुत्र अकेला श्मशान में। पिता को भारी चिन्ता हुई, पर क्या करे, विवशता ने उसे जकड़ दिया।

🔷 उधर सुवीर अमावस की अंधेरी रात में मरघट में अकेला था। इतना अकेलापन उसे पहली बार मिला था। पर उसे यहाँ डर लगने के बजाय बड़े आनन्द की अनुभूति हुई। वह भक्ति और प्रीति के साथ ‘नमो बुद्धस्स’ का जप करने लगा। जप करते-करते हृदय के तार जुड़ गए, भक्ति की संगीत जम गया, अन्तश्चेतना की वीणा बजने लगी। पहली दफा उसे ध्यान की झलक मिली। धीरे-धीरे वह ध्यान में डूब गया। यह बड़ी गहरी अनुभूति थी। सब तरफ से सुख बरस रहा था, पर शान्ति उसे भिगो रही थी। शरीर सोया था, अन्तर में जागरण का पर्व था। उजियारा ही उजियारा था। जैसे हजार-हजार सूरज एक साथ जग गए। जीवन सब तरफ से प्रकाशित हो गया। जो घटना किसी के लिए अभिशाप बन सकती थी, उसके लिए वरदान बन गयी।

🔶 अमावस की उस रात्रि में महानिशाकाल होते ही श्मशान जाग्रत् हो उठा। ब्रह्मराक्षस, पिशाच, योगिनियाँ, डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी के यूथ वहाँ नृत्य करने लगे। श्मशान का सम्पूर्ण वातावरण भयावह हो गया। परन्तु सुवीर की आत्मचेतना किसी अलौकिक राज्य में निमग्न थी। एक आध्यात्मिक प्रभामण्डल उसे घेरे था। नृत्य कर रही इन सूक्ष्म सत्ताओं ने जब उसकी यह भावदशा देखी, तो उन्होंने अपने को धन्य माना। वे भागे हुए गए और सम्राट के महल से सोने के बर्तनों में भोजन लेकर आए। उन सबने मिलकर उसे भोजन कराया एवं सेवा की। प्रातः होते ही वे सभी सूक्ष्म सत्ताएँ अदृश्य हो गयीं।

🔷 इधर सम्राट के सिपाहियों ने महल के खोये हुए बर्तनों की खोज की। और खोजते हुए उन्होंने सुवीर को पकड़ लिया। बन्दी सुवीर को सम्राट के सामने लाया गया। उन दिनों बिम्बसार का शासन था। वह स्वयं भगवान् तथागत के भक्त थे। उन्होंने सुवीर से सारी बात जाननी चाही। सुवीर ने भी उत्तर में सम्राट बिम्बसार को प्रारम्भ से सारी कथा कह सुनायी। चकित और हतप्रभ सम्राट उस बालक को लेकर भगवान् के पास पहुँचे। भगवान् इन दिनों राजगृह में ही ठहरे हुए थे। सारी बातें सुनकर भगवान् ने कहा- सम्राट! यह बालक ठीक कह रहा है। बुद्धानुस्मृति स्वयं के ही परम रूप की स्मृति है। जब तुम कहते हो ‘नमो बुद्धस्स’ तो तुम अपने ही परम दशा का स्मरण कर रहे हो।

🔶 यह सतह के द्वारा गहराई की पुकार है। यह परिधि के द्वारा केन्द्र का स्मरण है। यह कहते हुए उन्होंने यह धम्म गाथा कही-

🔷 सुप्पबुद्धं पबुज्झति सदा गोतम सावका। येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति॥

🔶 ‘जिनकी स्मृति दिन-रात सदा बुद्ध में लीन रहती है, वे गौतम के शिष्य सदा सुप्रबोध के साथ सोते और जागते हैं।’ भगवान् की इस बात ने सम्राट बिम्बसार को यह बोध दिया कि सद्गुरु के स्मरण से शिष्य सहज ही परम भावदशा को उपलब्ध हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003

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