शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

👉 भगवान तो परोपकार से प्रसन्न होते हैं

🔷 एक बार एकनाथ जी अन्य सन्तों के साथ प्रयाग से गंगाजी का जल काँवर में लेकर रामेश्वर जा रहे थे। रास्ते में एक रेतीला मैदान आया। गधा प्यास के मारे छटपटा रहा था। एकनाथ जी ने तुरन्त काँवर से लेकर गंगा जल गधे के मुख में डाला। गधा प्यास से तृप्त, स्वस्थ होकर वहाँ से चल दिया। एकनाथ के साथी संत प्रयाग के गंगाजल का इस प्रकार उपयोग होते देख क्रुद्ध हुए। एकनाथ ने उन्हें समझाया, “अरे सज्जनवृन्द! आप लोगों ने तो बार-बार सुना है कि भगवान् घट-घट-वासी है। तब भी ऐसे भोले बनते हो। जो वस्तु या ज्ञान समय पर काम न आवे वह व्यर्थ है। काँवर का जो जल गधे ने पिया, वह सीधे श्रीरामेश्वर पर चढ़ गया।

👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (भाग 2)

उसी बात को स्नेह और आत्मीयतापूर्वक कहें तो आपके संबंध भी अच्छे बने रहते हैं और आपकी बात भी मान ली जाती है। ऐसे समय किन्हीं व्यक्तियों या...