रविवार, 5 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 21)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔷 देवताओं ने सिद्धार्थ को राजकुमार न रहकर धर्म-चक्र-प्रवर्तन में संलग्न होने का परामर्श दिया था। सिद्ध पुरुष माने जाने वाले गोरखनाथ, मत्स्येंद्र नाथ के तप-वैभव के अधिकारी बने थे। रामानंद ने, कबीर को स्वर्ण खान कहीं नहीं सौंपी थी वरन् वह प्रतिभा प्रदान की थी जिसके कारण कुलीनता और विद्वत्ता के अभाव में भी अपने समय के प्रचंड प्रवर्तक के रूप में प्रख्यात हुए। भगवान के भक्तों में सर्वोपरि नारद माने जाते हैं। उन्हें वह ललक मिली थी कि जन-जन में भाव-संवेदना का बीजारोपण करते हुए अनवरत रूप से संलग्न रह सकें। पवन ने अपने पुत्र हनुमान् को वह वर्चस प्रदान किया था कि रामचरित्र में मेरुदंड जैसी भूमिका का निर्वाह कर सके।
  
🔶 गाँधी ने अपने प्रिय बिनोवा को महान प्रयोजनों के लिए मर मिटने की भाव-संवेदना प्रदान की थी। उनके संपर्क में आने वाले अन्य लोगों ने भी जुझारू प्रतिभा पाई और अपने चरित्र तथा कर्तृत्व से जनमानस पर गहरी छाप छोड़ने में सफल हो सके।
  
🔷 महर्षि अगस्त्य ने भगीरथ को राज-पाट छोड़कर गंगावतरण के महाप्रयास में संलग्न होने के लिए नियोजित किया था। लक्ष्य इतना उच्चस्तरीय था कि उनकी सफलता में योगदान देने के लिए स्वयं शंकर जी को कैलाश छोड़कर आना पड़ा था। योगी भर्तृहरि ने अपने भाई विक्रमादित्य को आदर्श शासक और भाँजे गोपीचंद को तत्त्वदर्शन के अवगाहन में संलग्न किया था। इससे अधिक और कुछ कोई अपने स्वजन संबंधियों को दे ही क्या सकता है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 26

👉 सुखी कैसे हो

🔶 “स्वार्थी और धनी आदमियों की समझ में न आने वाली एक सबसे रहस्यमयी गुत्थी यह है कि जहाँ उन्होंने सुख पाने की आशा की थी, वहाँ उन्हें सुख ...