रविवार, 10 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 4)

🔶 समाज में मृतक-भोज की कुप्रथा इसी प्रकार की प्रतिगामिनी विचारधारा के कारण ही अब तक चली आ रही है नहीं तो इसकी निःसारता, निरर्थकता तथा अहितकारिता बहुत पहले सिद्ध हो चुकी है और लोग इसके दुःखद परिणामों से बहुत अधिक त्रस्त हो चुके हैं। अब यह कुप्रथा अन्ध-विश्वास के एक कच्चे सूत्र के आधार पर टिकी है। अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि समाज के बुद्धिमान् साहसी लोग इसका प्रचलन उठा कर मृत्यु भोज के बहिष्कार की नई स्वस्थ एवं हितकर परम्परा का सूत्रपात कर दें। सूत्रपात भर की देर है बाकी समाज के लोग तो भेड़चाल की आदत वाले होने से यों ही बहिष्कार करने लगेंगे। अब देखना यह है कि मृतक भोज के बहिष्कार का प्रथम सूत्रधार बनकर श्रेय कौन साहसी कहां और किस समय लेता है?

🔷 असलियत वास्तव में यह है कि अपने किसी स्वजन सम्बन्धी की मृत्यु पर किसी को प्रसन्नता होती नहीं जिसमें वह इस प्रकार के भोज करने के लिये उत्साहित हो। यह मृतक-भोज वह खुशी से नहीं करता बल्कि उसमें जबरदस्ती कराया जाता है। यदि मृतक-भोज खाने वाले भोजन करने को तैयार न हों तो किसी भी शोक संतप्त व्यक्ति को उत्साह न होगा कि वह एक बड़ी दावत का आयोजन करे ही और लोगों को खाने के लिए सानुरोध आमन्त्रित करे। यदि लोग एक बार खाने से इन्कार करें तो भोज देने को विवश—मृतक का सम्बन्धी खुशी-खुशी दस बार अपनी बर्बादी बचाने को तैयार हो जाये और लोगों का आभार माने।

🔶 यदि एक बार किसी खुशी के अवसर पर कोई किसी भोज का आयोजन करता है और उसके इष्ट-मित्र सम्बन्धी तथा सजातीय लोग आने और खाने से इन्कार कर दें तब तो अवश्य कुछ दुःख का विषय हो सकता है। मृतक-भोज के लिये आने और भोजन करने से इन्कार किये जाने पर आयोजक के दिन दुःखने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह तो उसकी प्रसन्नता का प्रसंग होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 85

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...