बुधवार, 22 नवंबर 2023

👉 एक से अनेक बनने की इच्छा और आवश्यकता

एक से अनेक बनने की इच्छा और आवश्यकता ने ही इस संसार का सृजन किया । ब्रह्म ने सोचा एकाकी जीवन नीरस और निरर्थक है, उसे विकसित और विस्तृत होना चाहिए । इच्छा-संकल्प के रूप में बदली और उसने क्रिया बनकर सृष्टि का मूर्तरूप धारण कर लिया । ब्रह्म की इस वंश परम्परा को साथ लेकर ही जीव जन्मा है । एक ही आकांक्षा और ज्योति वह भी जलाये बैठा है - विकसित होना - विस्तार करना । यार-दोस्तों की मंडली, मेला-ठेला देखने की प्रवृति, बस्तियों में रहने की इच्छा, परिवार बनाने की आकांक्षा, नेता बनने की उमंग, आदि लगभग सभी क्रिया-कलापों के पीछे मूलभूत अन्त:प्रेरणा यही रहती है कि उसे एकाकी नहीं विस्तृत होकर रहना चाहिए । वृक्ष-वनस्पतियों तक में यही परम्परा है । एक से अनेक होने की वृति ने ही उन्हें फलने-फूलने का अवसर दिया है । काम-कौतुक, प्रजनन, दम्पत्ति, साहचर्य, परिवार प्रेम के पीछे वही ब्रह्म परम्परा सन्नहित है जिसने इस सृष्टि का सृजन कराया । उससे छुटकारा किसी को नहीं ।

प्रकृति ने विषयानन्द के आकर्षण से समस्त प्राणियों को इसलिये बॉंधा है कि वे विकास-विस्तार के लिए प्रयत्नशील रहें । माता के हृदय में वात्सल्य का सृजन इसीलिए हुआ है । दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे के बंधन में बँधना इसलिए स्वीकार किया जाता है -उसमें उल्लास इसलिए रहता है कि अनेक झंझटों और उत्तरदायित्वों के बढ़ते हुए भी एक से दो और दो से अधिक बनने की आन्तरिक अभिलाषा की पूर्ति होती है ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.२६)


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