बुधवार, 21 मार्च 2018

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
 

देवियो! भाइयो!!

🔶 आप जिस कल्प-साधना सत्र में आए हुए हैं, उसका उद्देश्य समझने की कोशिश करें। अनगढ़ और अस्त-व्यस्त जीवन को सुव्यवस्थित जीवन में बदल देने की बात इस कल्प-साधना में विशेष रूप से ध्यान रखी गई है। जीवनभर हम अनगढ़ रहे हैं, बन्दरों की तरह उचक-मचक करने वाले, लक्ष्यहीन बच्चों की तरह इधर-उधर भागने वाले और तरह-तरह की चीजों पर मन चलाने वाले हम रहे हैं; न कोई अनुशासन मन के ऊपर रहा, न कोई लक्ष्य रहा और न कोई दिशा रही। बस, यही है हमारे जीवन की संक्षिप्त कहानी और इस कहानी में अब नया अध्याय जुड़ना चाहिए। फिर आपकी अस्त-व्यस्तता को अनुशासन में बदल जाना चाहिए और आपकी लक्ष्यहीनता को अब एक दिशा पकड़ लेनी चाहिए कि अब हमारा जीवन किधर जाएगा?

🔷 इसी का प्राथमिक अभ्यास कराने के लिए आपको कल्प-साधना शिविर में बुलाया गया है। आप अपनी मनःस्थिति को उसी के अनुरूप बनाइए। क्रियाएँ जो आपसे कराई जा रही हैं, ये क्रियाएँ अपने आप में भी महत्त्वपूर्ण हैं। उपवास अपने आप में भी लाभदायक होता है। पेट पर इसका असर पड़ता है; पर आप यहाँ तक सीमित मत रहिए। उपवास के लिए हम क्यों बुलाते हैं आपको?  उपवास तो आप घर पर भी कर सकते हैं, बहुत-से आदमी करते भी हैं; नवरात्रि पर उपवास करते हैं, दूसरे उपवास करते हैं; पर यहाँ हमने केवल उपवास के ही लिए नहीं बुलाया आपको। यहाँ हमने आपको अनुशासन पालने करने के लिए बुलाया है—तरह-तरह के अनुशासन। शुरुआत तो आपकी जीभ से कराई है। जीभ का अनुशासन अगर आप निभा लेंगे, तो और दूसरे अनुशासन, जो जीवन के लिए और अत्यधिक उपयोगी हैं, उनको भी आप पालने में सफल हो जाएँगे।

🔶 गाँधीजी ने अपनी ‘सप्त महाव्रत’ नाम की पुस्तक में पहला अध्याय अस्वाद का लिखा है। उन्होंने कहा है कि जो आदमी अपनी जीभ पर काबू कर लेगा, वह अपनी ज्ञानेन्द्रियों पर और मन पर भी काबू प्राप्त कर लेगा। उन्होंने यह भी लिखा है कोई आदमी ब्रह्मचर्य की बात विचार करता हो, तो उसको पहले अपनी जीभ पर काबू पाने की कोशिश करनी चाहिए। जिस आदमी की जीभ पर लगाम नहीं है, वह ब्रह्मचर्य का कभी पालन नहीं कर पायेगा। उच्छृंखल जीभ न केवल आहार को उच्छृंखल बनाती है, न केवल मस्तिष्क को उच्छृंखल बनाती है, बल्कि हमारी विकृतियों को भड़काने में भी काम आती है, इसलिए जीभ का अनुशासन आवश्यक माना गया है। आप इस उद्देश्य को समझिये। आप खाली दलिया खायेंगे, जौ, चावल खाएँगे, वह तो ठीक है; खाएँगे, तो अच्छी बात है; खाएँगे, तो सात्विक है। अनावश्यक वस्तुएँ न खाएँगे, तो कौन-सी हर्ज की बात है? आवश्यक वस्तुओं को एक महीने रहकर खाएँगे, यह तो बहुत अच्छी बात है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?

हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषिय...