बुधवार, 4 जनवरी 2023

👉 जीवन के गरिमामय बोध तो हो

एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें खुशी-खुशी सिर पर रखकर घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद  हो गया और धीरे-धीरे उसकी गैर जानकारी में वे चावल पीछे की ओर गिरते गये । यहाँ तक कि कुछ आगे जाने पर उसकी बोरी  ही खाली हो गई। जब पीछे देखा तो उसे होश आया।   फर्लांगों से धीरे-धीरे वह चावल फैल रहे थे और धूल में मिलकर दृष्टिï से ओझल हो गए थे। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन दानों को फिर  से पा सका होता। पर  वे तो पूरी तरह धूल में गढ़ चुके थे, वे मिल नहीं सकते थे। बेचारा खाली हाथ घर लौटा, दिन भर का परिश्रम, चावलों का बिखर जाना, पेट की जलती हुई ज्वाला इन तीनों की स्मृति उसे बेचैन बनाये दे रही थी।
    
हमारे जीवन का अमूल्य हार कितना सुन्दर है; हम इसे कितना प्यार करते हैं। माता खुद भूखी रहकर अपने नन्हे से बालक को मिठाई खरीदकर खिलाती है, बालक के मल मूत्रों में खुद पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौने पर सुलाती है। वह बड़े से बड़ा नुकसान कर दे, एक कहुआ शब्द तक नहीं कहती।
  
हमारी आत्मा हमारे जीवन से इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक प्यार करती है। जीवन सुखी बीते, उसे आनन्द और प्रसन्नता प्राप्त हो, इसके लिए आत्मा पाप भी करती है। खुद नरकों की यातना सहती है- खुद मलमूत्रों में पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौन पर सुलाती है। यह प्यार माता के प्यार से किसी प्रकार कम नहीं है। जीवन को वह जितना प्यार करती हैं, उतना क्या कोई किसी को कर सकता है?
  
पर हाय! इसकी एक-एक मणि चुपके-चुपके मजदूर के चावलों की तरह बिखरती जा रही है। और हम मदहोश होकर मस्ती के गीत गाते हुए झूम-झूमकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। जीवन-लड़ी के अनमोल मोती घड़ी, घंटे, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्षों के रूप में धीरे-धीरे व्यतीत होते जा रहे हैं। एक ओर माता कहती है कि मेरा पूत बड़ा हो रहा है, दूसरी ओर मौत कहती है कि मेरा ग्रास निकट आ रहा है। बूँद-बूँद करके जीवन रस टपक रहा है और घड़ा खाली होता जा रहा है। कौन जानता है कि हमारी थैली में थोड़ा-बहुत कुछ बचा भी है! फिर भी क्या हम इस समस्या पर विचार करते हैं? कभी सोचते हैं कि समय क्या वस्तु है? उसका क्या मूल्य है?  यदि हम नहीं सोचते और अपनी पीनक को ही स्वर्ग-सुख मानते हैं तो सचमुच बीते वर्ष को गँवाना और नवीन वर्ष का आना कोई विशेष महत्व नहीं रखता।
  
क्या आप कभी इस पर भी विचार करते हैं कि आपके जीवन का इतना बड़ा भाग, सर्वोत्तम अंश किस प्रकार बर्बाद हो गया? क्या इसे इसी प्रकार नष्टï करना चाहिए था? क्या आत्मा को इन्हीं कर्मों की पूर्ति के लिये ईश्वर ने भेजा था, जिन को अब तक तुमने पूरा किया है? याद रखना, वह दिन दूर नहीं है जब तुम्हें यही प्रश्र शूल की तरह दुख देंगे। जब जीवन रस की अन्तिम बूँद टपक जायेगी और तुम मृत्यु के कंधे पर लटक रहे होगे, तब तुम्हारी तेज निगाह बुढ़ापा, अधेड़ावस्था, यौवन, किशोरावस्था, बचपन और गर्भावस्था तक दौड़ेगी। अपने अमूल्य हार की एक-एक मणि धूलि में लोटती हुई दिखाई देगी। तब अपनी मदहोशी पर तिलमिला उठोगे।।  आज तो समय काटने के लिये ताश या फलाश खेलने की तरकीब सोचनी पड़ती है। पर परसों पछतायेगा इन अमूल्य क्षणों के लिए! और शिर धुन-धुनकर रोयेगा अपने इस पाजीपन पर।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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