मंगलवार, 16 मई 2023

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 2)

देखना यह है कि जीवन सम्पदा को किस निमित्त लगाया जाये? इसके लिए प्रचलन देखने की आवश्यकता है। मछलियों में बड़ी छोटी को निगल जाती है और उस बड़ी को मछुए के जाल में अपना प्राण गँवाना पड़ता है। प्रचलन ऐसा ही है। बहुमत ऐसे ही निरर्थक काम करता रहता है। समस्त पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं, उतने दृश्य और अदृश्य कृमि कीटक एक मील की परिधि में रहा करते हैं। पर उनकी उपयोगिता क्या? पेट प्रजनन के कुचक्र में इधर से उधर भटकते रहते हैं। इसी स्तर का जीवन अधिकाँश मनुष्य जीते हैं। उनकी नकल क्या करनी? वनमानुषों, नर पशुओं का अनुकरण भी कोई करने लायक बात है।

बहुसंख्यक लोगों का क्रिया-कलाप ही प्रचलन कहाता है। बहुसंख्यक तो अपनी आत्मा सत्ता के अस्तित्व तक को भुला बैठे हैं। उन्हें अपना आपा काया मात्र के रूप में परिलक्षित होता है। अपनापन उन्हें शरीर तक सीमित प्रतीत होता है इसलिए उसी की सुख-सुविधा साधने में जीवन को रुचिपूर्वक खपाते रहते हैं। पेट की भूख, जननेन्द्रिय की तरंग, धन की ललक, बड़प्पन की बड़ाई की सनक। बस इसी सीमा में उनके क्रिया-कलाप बनते हैं। बच्चे जनने और उन्हें पालने में तो चुहिया भी प्रवीण होती है।

वह तीन सप्ताह में प्रौढ़ हो जाती है और एक बार में आठ दस बच्चे जनती है। यह प्रजनन वर्ष में प्रायः चार बार होता है। इस प्रकार तीस-चालीस बच्चों की जननी वह एक वर्ष में ही बन जाती है। हर बार पति बदलने पड़ते हैं इस प्रकार ढेरों की वह पर्यंक शाथिनी बन लेती है। इसमें कौन-सा व कैसा बड़प्पन? क्या गौरव, क्या महत्व? मनुष्य भी किशोरावस्था में ही प्रजनन कर्म में लगता है और बच्चे पैदा करने के अतिरिक्त उन्हें पालता भी है। यही जाल-जंजाल इतना बड़ा है जिसका कि ताना-बाना बुनते बुढ़ापा आ धमकता है और मौत अपने थैले में चना चबैना की तरह समेट ले जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3


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