शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 63)

🌹  राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔴 इक्कीसवीं सदी की सम्पूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धांतों पर निर्धारित होगी। हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में, उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा। इस भवितव्यता के अनुरूप हम अभी से धीमी-धीमी तैयारियाँ शुरू कर दें तो यह अपने हित में होगा। ब्रह्म मुहूर्त्त में जागकर नित्यकर्म से निपट लेने वाले व्यक्ति सूर्योदय होते ही अपने क्रियाकलापों में जुट जाते हैं, जबकि दिन चढ़े तक सोते रहने वाले कितने ही कामों में पिछड़ जाते हैं।

🔵 मूर्धन्य मनीषियों का कहना है कि अगले दिनों एकता, एक सर्वमान्य व्यवस्था होगी। सभी लोग मिलजुल कर रहने के लिए विवश होंगे। डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने, ढाई ईंट की मस्जिद खड़ी करने का कोई उपहासास्पद खिलवाड़ नहीं करेगा। सभ्यता के बढ़ते चरणों में एकता ही सबकी आराध्य होगी। बिलगाव का प्रदर्शन करने वाली बाल-खिलवाड़ देर तक अपनी अलग पहचान न रह सकेगी। बिखराव सहन न होगा। बिलगाव को कहीं से भी समर्थन नहीं मिलेगा। संकीर्ण स्वार्थपरता और अपने मतलब से मतलब रखने वाली क्षुद्रता किसी भी क्षेत्र में व्यावहारिक न होगी। मिलजुल कर रहने पर ही शांति, सुविधा और प्रगति की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श अब समाजवाद, समूहवाद, संगठन, एकीकरण का विधान बन कर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा। उसे सभी विज्ञजनों का समान समर्थन भी मिलेगा।

🔴 अगली दुनिया एकता का लक्ष्य स्वीकारने के लिए निश्चय कर चुकी है। अड़ंगेबाजी से निबटना ही शेष है। वे प्रवाह में बहने वाले पत्तों की तरह लहरों पर उछलते कूदते कहीं से कहीं जा पहुँचेंगे। चक्रवात से टकराने की मूर्खता करने वाले तिनकों के अस्तित्व उस वायु भँवर में फँस कर अपना अस्तित्व तक गँवा बैठते हैं। एकता अब अपरिहार्य होकर रहेगी। जाति-पाँति के नाम पर रंग, वर्ण और लिंग के आधार पर अलग-अलग कबीले बसा कर रहना आदिम काम में ही संभव था, आज के औचित्य को समर्थन देने वाले युग में नहीं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.87

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.16

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