सोमवार, 19 जून 2017

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 4)

🔴 जब इतने बड़े-बड़े महापुरुष और भगवान के अवतार दुनिया में नहीं रहे, तो और कौन रहेगा? अगर अमृत कहीं रहा होता तो इन लोगों ने जरूर पी लिया होता; पर अध्यात्म का एक अमृत है जो आपको यहाँ मिल सकता है, आप जिसके नीचे बैठकर अजर-अमर हो सकते हैं। यह अध्यात्म ज्ञान है और जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम जीवात्मा हैं, शरीर नहीं हैं, उसी दिन आपका मौत का भय निकल जाएगा और योजनाएँ ऐसी बनेंगी, जो आपके जन्म-जन्मान्तर की समस्याओं के समाधान करने में समर्थ होती हों। आज तो आप छोटे आदमी हैं और और छोटी समस्याओं में डूबे रहते हैं। पेट कैसे चुकायेंगे? लड़कियों की शादी कैसे होगी? हमारी नौकरी में तरक्की कैसी होगी इत्यादि छोटी चीजों में आप लगे रहते हैं, लेकिन आप अगर कभी अमर हो गये तब? तब आप अमर लोगों की तरह विचार करेंगे और यह सोचेंगे कि अपने उत्थान के साथ-साथ सारे विश्व का उत्थान करने के लिए क्या करना चाहिए और कैसे बनना चाहिए?  

🔵 बस, यही है यहाँ की परिस्थितियाँ, जिनसे लाभ उठाना चाहिए। यहाँ के वातावरण का आप लाभ उठाइए। साधना-क्रम जो आप करते हैं, वह भी ठीक है, वह भी अच्छी बात है; लेकिन साधना-क्रम के अलावा जो यहाँ आपको मिल रहा है, सान्निध्य मिल रहा है, आप इसकी उपेक्षा मत कीजिए। आप यहाँ ऐसे वातावरण के सान्निध्य में हैं जो आपको मानसिक दृष्टि से कायाकल्प कर सकने में पूरी तरी से सामर्थ्य हैं। कायाकल्प शरीर का नहीं हो सकता, प्रकृति का हो सकता है। प्रकृति ही बदल सकती है आदमी की। आकृति? आकृति नहीं बदल सकती। आकृति बदल भी कैसे सकते हैं हम?
 
🔴 आपकी नाक की जैसी बनावट है, अब किसी और तरह की नाक कैसे काट के लगा दें आपके! आपकी लंबी नाक है, आप क्या चाहते हैं, चौड़ी नाक हो जाए, यह हम कैसे कर सकते हैं? बताइये? आपके दाँत कैसे हैं? बड़े-बड़े? तो अब हम दाँतों को उखाड़ के नये दाँत कैसे लगा दें? आपका शरीर दुबला है, तो अब हम कैसे मोटा बना दें? इसलिए जो चीज संभव नहीं है, वह संभव कैसे हो सकती है? आकृतियाँ नहीं बदल सकतीं आदमी की, प्रकृति बदल सकती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी के बारे में रामायण में कहा है। त्रिवेणी का माहात्म्य उन्होंने बताया है, तीर्थराज का माहात्म्य बताते हुए उन्होंने कहा है कि कौए कोयल हो जाते हैं, बगुले हंस हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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