सोमवार, 22 मई 2017

👉 आवश्यकता है दृढ़ विवेकयुक्त आस्था की

🔵 इस समय हम इतिहास के उन महायुगों में से एक युग में हैं, जबकि मानवता भविष्य में छलाँग लगा रही है। हम संक्रमण काल के व्यक्तित्व हैं, जो इतिहास की नयी स्थिति में कार्यरत हैं। व्याकुलता के स्वर-निराशा के चिह्न, जिन्हें हम समूचे विश्व में देख रहे हैं, वे जीवन के दृष्टिकोणों में और व्यवहार में आमूल परिवर्तन की माँग कर रहे हैं, जिससे कि आदर्शों की गरिमा एवं मनुष्यत्व को पहचाना जा सके।

🔴 अगर हम अब तक चले आ रहे मृत रूपों को छोड़ने और नए आदर्शों वाली संस्था की रचना करने में सक्षम नहीं होते, तो हम समाप्त हो जाएँगे। हमने एक महान सभ्यता के निर्माण के लिए, उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है, लेकिन इसे नियंत्रित करने और सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त बुद्धि अर्जित नहीं की है। विचारों और सिद्धांतों के रूप में हमारे पास युगों-युगों की धरोहर है, लेकिन यह सब तब तक व्यर्थ है, जब तक हम इसे युगानुरूप बनाकर अपने व्यवहार में न ले आएँ, स्वयं आत्मसात् न कर लें।
  
🔵 हमारी उपलब्धियाँ अगणित और गौरवास्पद हो सकती हैं। फिर भी हमें अधिक प्रखरता, साहस एवं अनुशासन की आवश्यकता है। अगर अपने आदर्शों एवं उद्देश्य के गौरव की रक्षा करनी है, तो अपने व्यक्तित्व का नवीनीकरण करना होगा। आदमी अपनी पहचान की, जीवन के अर्थ की और उस हार के महत्त्व की खोज कर रहा है, जो उसे एक ऐसे यथार्थ का पल्ला पकड़ने से मिलती है, जो उसके हाथों टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। अपनी शक्ति एवं समृद्धि के शिखर पर हम असुरक्षा के गहरे क्षणों का अनुभव कर रहे हैं। अपनी सभी प्रगतियों के बावजूद हम आज जितनी अर्थहीनता और निरर्थकता का अनुभव कर रहे हैं, उतना पहले कभी नहीं किया।

🔴 समर्थ सत्ता पर विश्वास आम इनसान को अनुशासित करने वाली शक्ति रहा है। शायद इस विश्वास की कमी ही वर्तमान दुरावस्था के लिए उत्तरदायी है। आज हमें एक ऐसी आस्था की आवश्यकता है, जो विवेकशील हो, जिसे हम बौद्धिक निष्ठा और सौन्दर्यशास्त्रीय विश्वास के साथ अपना सकें, एक बड़ी लचीली आस्था समूची मानवजाति के लिए, जिसमें प्रत्येक जीवित धर्म अपना योगदान कर सकता है। हमें एक ऐसी आस्था की आवश्यकता है, जो समूची मानव जाति में निष्ठा रखे, इसके इस या उस टुकड़े पर नहीं। एक ऐसी आस्था, जिसका पल्ला निरपेक्ष और प्रबुद्ध मस्तिष्क सम्मुख विनाश के समय भी पकड़े रह सके।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 77

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