सोमवार, 15 मई 2017

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए। (भाग 2)

🔵 नारी जन्मदात्री है। समाज का प्रत्येक भावी सदस्य उसकी गोद में पल कर संसार में खड़ा होता है। उसके स्तन का अमृत पीकर पुष्ट होता है। उसकी हँसी से हँसना और उसकी वाणी से बोलना सीखता है। उसकी कृपा से ही जीकर और उसके ही अच्छे-बुरे संस्कार लेकर अपने जीवन क्षेत्र में उतरता है। तात्पर्य यह कि जैसी माँ होगी, सन्तान अधिकाँशतः उसी प्रकार की होगी।

🔴 भारत के अतीत-कालीन गौरव में नारियों का बहुत कुछ अंश-दान रहा है। उस समय संतान की अच्छाई-बुराई का सम्बन्ध माँ की मर्यादा के साथ जुड़ा था। वह अपनी मान-मर्यादा की प्रतिष्ठा के लिये सन्तान को बड़े उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से पालती थी। देश, काल और समाज की आवश्यकता के अनुरूप सन्तान देना अपना परम-पावन कर्तव्य समझती थी। यही कारण है कि जब-जब युगानुसार सन्त, महात्मा, त्यागी, दानी योद्धा, वीर और बलिदानियों की आवश्यकता पड़ी, उसने अपनी गोद में पाल-पाल कर दिये।

🔵 किन्तु वह अपने इस दायित्व को निभा तब ही सकी है। जब उसको स्वयं अपना विकास करने का अवसर दिया गया है। जिस माँ का स्वयं अपना विकास न हुआ हो, वह भला विकासशील संतान दे भी कैसे सकती है। जिसको देश-काल की आवश्यकता और समाज की स्थिति और संसार की गतिविधि का ज्ञान ही न हो, वह उसके अनुसार अपनी सन्तान को किस प्रकार बना सकती है? अपने इस दायित्व को ठीक प्रकार से निभा सकने के लिये आवश्यक है कि नारी को सारे शैक्षणिक एवं सामाजिक अधिकार समुचित रूप से दिये जायें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 27

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