शनिवार, 13 मई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 May

🔴 “ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।”

🔵 “गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है, उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना। यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए- उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा सहायता अपनी ही सेवा सहायता है।”                  
                                                   
🔴 “प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है- जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है। जो उसी का होकर जीना चाहता है उसी को भक्त कहना चाहिए। दूसरे तो विदूषक हैं। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है। भक्ति में तो आत्म समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है?” 

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...