शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

👉 पुरुषार्थ कीजिए! (अन्तिम भाग)

🔴 मनुष्य को संसार में महत्ता प्रदान करने वाला पुरुषार्थ ही है। उसी की मात्रा से एक साधारण तथा महान व्यक्ति में अन्तर है। पुरुषार्थ की बुद्धि पर ही मनुष्य की उन्नति निर्भर है। सामर्थ्य सम्पन्न मनुष्य ही सुख, सम्पत्ति, यश, कीर्ति एवं शान्ति प्राप्त कर सकता है।

🔵 पुरुषार्थ का निर्माण कई मानसिक तत्वों के सम्मिश्रण से होता है। (1) साहस- इन सबमें मुख्य है। दैनिक जीवन, नये कार्यों, तथा कठिनाई के समय हमें कोई भी वाह्य शक्ति आश्रय प्रदान नहीं कर सकती। साहसी वह कार्य कर दिखाता है जिसे बलवान भी नहीं कर पाते। साहस का सम्बन्ध मनुष्य के अन्तः स्थित निर्भयता की भावना से है। उसी से साहस की वृद्धि होती है। (2) दृढ़ता- दूसरा तत्व है जो पुरुषार्थ प्रदान करता है। दृढ़ व्यक्ति अपने कार्यों में खरा और पूरा होता है। वह एकाग्र होकर अपने कर्तव्य पर डटा रहता है। (3) महानता की महत्वाकाँक्षा- पुरुषार्थी को नवीन उत्तरदायित्व-जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने का निमंत्रण देती है और मुसीबत में धैर्य एवं आश्वासन प्रदान करती है।

🔴 स्वेटमार्डन साहब के अनुसार बड़प्पन की भावना रखने से हमारी आत्मा की सर्वोत्कृष्ट शक्तियों का विकास होता है, वे जागृत हो जाती हैं। इस गुण के बल पर पुरुषार्थी जिस दिशा में बढ़ता है, उसी में ख्याति प्राप्त करता चलता है वह अपने महत्व को समझता है, और अपने सभी शक्तियों के द्वारा सदा आत्म महत्व के बढ़ाता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति सितम्बर 1948
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/September/v2.17

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 2)

🔴 दूसरा वाला प्रयोग हमने किया- साधु का। जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाल...