शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 April

🔴 जो कार्य और उत्तरदायित्व आपके जिम्मे सौंपा गया है वह यह है कि दीपक से दीपक को आप जलाएं। बुझे हुए दीपक से दीपक नहीं जलाया जा सकता। एक दीपक से दूसरा दीपक जलाना हो तो पहले हमको जलना पड़ेगा। इसके बाद में दूसरा दीपक जलाया जा सकेगा। आप स्वयं ज्वलंत दीपक के तरीके से अगर बनने में समर्थ हो सके तो हमारी वह सारी की सारी आकांक्षा पूरी हो जायेगी जिसको लेकर के हम चले हैं और यह मिशन चलाया है। आपका सारा ध्यान यहीं इकट्ठा होना चाहिए कि क्या हम अपने आपको एक मजबूत ठप्पे के रूप में बनाने में समर्थ हो गए?

🔵 प्यार-मोहब्बत का व्यवहार आपको बोलना सीखना चाहिए। जहां कहीं भी शाखा में जाना है, कार्यकर्त्ताओं के बीच में जाना है और जनता के बीच में जाना है, उन लोगों के साथ में आपके बातचीत का ढंग ऐसा होना चाहिए कि उसमें प्यार ही प्यार भरा हुआ हो। दूसरों का दिल जीतने के लिए आप दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने के लिए इस तरह का आचरण लेकर जाएं, ताकि लोगों को यह कहने का मौका न मिले कि गुरुजी के पसंदीदे नाकाबिल हैं। अब आपकी इज्जत, आपकी इज्जत नहीं, हमारी इज्जत है। जैसे हमारी इज्जत हमारी इज्जत नहीं, हमारे मिशन की इज्जत है। हमारी और मिशन की इज्जत की रक्षा करना अब आपका काम है।

🔴 परिजनों! सन्त हमेशा गरीबों जैसा होता है। अमीरों जैसा सन्त नहीं होता। संत कभी भी अमीर होकर नहीं चला है। जो आदमी हाथी पर सवार होकर जाता है, वह कैसे सन्त हो सकता है? संत को पैदल चलना पड़ता है। सन्त को मामूली कपड़े पहनकर चलना पड़ता है। सन्त चांदी की गाड़ी पर कैसे सवारी कर सकता है? आपको अपने पुराने बड़प्पन छोड़ देने चाहिए-पुराने बड़प्पन की बात भूल जानी चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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