मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 39)

🌹 इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकता

🔵 विचार क्रांति की सर्वोपरि आवश्यकता है। हेय चिंतन ही दरिद्रता, अशिक्षा, अस्वस्थता, कुचेष्टा और दुष्प्रवृत्तियों का निमित्त है। इन बीमारियों का अलग-अलग इलाज कारगर नहीं हो सकता। रक्त शोधक उपचार करने से ही आए दिन उगने वाले फोड़े-फुंसियों से छुटकारा मिलता है। जड़ सींचने से ही पेड़ हरा होता है। वह कार्य पत्तों को पोसने से पूरा होना संभव नहीं। विकास और सुधार के लिए तो अनेकानेक काम करने को पड़े हैं, पर यदि उन सबको समेटने की अपेक्षा विचारों का तारतम्य सही बिठा लिया जाए तो अन्यान्य बहुमुखी विकृतियों पर सहज काबू पाया जा सकता है। विचारों से ही कार्य विनिर्मित होते हैं। इन्हीं कारण उत्थान-पतन की भूमिका दृष्टिगोचर होती है। यदि विचारों को शालीनता, सज्जनता, नीति-निष्ठा कर्तव्यपरायणता और समाजनिष्ठा की दिशा में उन्मुख किया जा सके तो फिर शरीर एवं साधनों के माध्यम से मात्र वे ही कार्य बन पड़ेंगे, जो सुधार एवं विकास के लिये आवश्यक हैं।     

🔴 प्राचीनकाल में घर-घर अलख जगाने, संपर्क साधने और विचार-विनिमय करने जैसे कुछ ही कार्य ऐसे थे, जिनके सहारे लोकमानस का परिष्कार बन पड़ता था। अधिक लोगों को एक स्थान पर एकत्र करने के लिये सामूहिक कर्मकाण्डों की आवश्यकता होती थी, पर अब तो विज्ञान ने उन सभी कार्यों को सरल बना दिया है। यदि उन्हें योजनाबद्ध रूप से बड़े पैमाने पर किया जा सके तो क्षेत्र की व्यापकता होते हुए भी प्रयोजन की पूर्ति में अधिक कठिनाई न रहेगी।                          

🔵 प्रेस अपने समय का एक वरदान है। इसके द्वारा कम समय में अधिक लोगों तक सस्ते आधार पर पहुँचना संभव हो सकता है। लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर, वीडियो तथा स्लाइड प्रोजेक्टर जैसे सस्ते उपकरण भी अधिक लोगों तक कम समय में विचारोत्तेजक प्रवाह पहुँचाने में समर्थ हो सकते हैं। संगीत-मंडलियाँ यदि योजनाबद्ध रूप से काम करें तो उनके सहारे भी जागरण का बड़ा काम बड़े परिमाण में बन सकना संभव हो सकता है। ऐसे ही अन्य छोटे-बड़े माध्यम से ढूँढ़े जा सकते हैं, जो उल्टी दिशा में बहते-प्रवाह को उलटकर सीधा कर सकें। यह प्रचार प्रतिभासम्पन्न लोगों की सहायता से और भी अच्छी तरह व्यापक परिधि में पूर्ण हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...