गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 जप में ध्यान द्वारा प्राणप्रतिष्ठा (भाग 1)

🌹 आमतौर से उपासना करने वालों को यह शिकायत रहती है कि भजन करते समय उनका मन स्थिर नहीं रहता, अनेक जगह भागता रहता है। साधना में मन न लगे, चित्त कहीं का मारा कहीं भागा फिरे तो उसमें वह आनंद नहीं आता, जो आना चाहिए।

🔴 इस कठिनाई का उपाय सोचने से पूर्व यह विचार करना होगा कि मन क्यों भागता है? और भागकर कहाँ जाता है? हमें जानना चाहिए कि मन प्रेम का गुलाम है। जहाँ भी जिस वस्तु में भी प्रेम मिलेगा, वहीं मन उसी प्रकार दौड़ जाएगा, जैसे फूल पर भौंरा जा पहुँचता है। साधारणतया लोगों का प्रेम अपनी स्त्री-पुत्र, मित्र-धन-व्यवसाय, यश-मनोरंजन आदि में होता है। इन्हीं प्रिय वस्तुओं में मन दौड़-दौड़कर जाता है।

🔵 भजन को हम एक चिन्हपूजा की तरह पूरा तो करते हैं, पर उसमें सच्चा प्रेम नहीं होता। इष्टदेव को भी हम कोई बहुत दूर का अपने से सर्वथा भिन्न तत्व मानते हैं, उससे कुछ चाहते तो हैं, पर अपने तथा उसके बीच में कोई प्रेम और आत्मीयता का संबंध-सूत्र नहीं देखते। राजा और भिखारी के बीच जो अंतर होता है, वही हमें अपने और इष्टदेव के भीतर लगता है। ऐसी दशा में मन यदि भजन में न लगे और अपने प्रिय विषयों में भागे तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह स्वाभाविक ही है।

🔴 भजन में मन लगे इसके लिए बलपूर्वक मन को रोकने का प्रयत्न निष्फल ही रहता है। यह एक तथ्य है कि मन प्रेम का गुलाम है। वह वहीं टिकेगा, जहाँ प्रेम होगा। यदि भजन के साथ प्रेमभावना का समावेश कर लिया जाए तो निश्चित रूप से मन उसमें उसी प्रकार लगा रहेगा जैसा संसारी मनुष्यों का अपने स्त्री-पुत्र धन आदि में लगा रहता है।

🌹 -अखण्ड ज्योति – मई 2005 पृष्ठ 19

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