गुरुवार, 30 मार्च 2017

👉 जीवन में सच्ची शांति के दर्शन

🔵 मुनष्य के अंत:स्थल में जो शुद्ध-बुद्ध-चैतन्य, सत् -चित् -आनंद, सत्य-शिव-सुंदर, अजर-अमर सत्ता है, वही परमात्मा है। मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार के चतुष्टय को जीव कहते हैं। यह जीव-आत्मा से भिन्न भी है और अभिन्न भी। इसे द्वैत भी कह सकते हैं और अद्वैत भी। अग्नि में लकड़ी जलने से धुँआ उत्पन्न होता है। धुँए को अग्नि से अलग कहा जा सकता है, यह द्वैत है। धुँआ अग्नि के कारण उत्पन्न हुआ है, अग्नि बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं, वह अग्नि का ही अंग है, अत: अद्वैत है। आत्मा अग्नि है और जीव धुँआ है। दोनों अलग भी हैं और एक भी। उपनिषदों में इसे एक वृक्ष पर बैठे हुए दो पक्षियों की उपमा दी गई है। गीता में इन दोनों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए एक को क्षर (नाशवान्) एक को अक्षर (अविनाशी) कहा गया है।

🔴 भ्रम से, अज्ञान से, माया से, शैतान के बहकावे से, इन दोनों की एकता पृथकता में बदल जाती है। यही दु:ख का, शोक का, संताप का, क्लेश का, वेदना का कारण है। जहाँ मन और आत्मा का एकीकरण होता है, जहाँ दोनों की इच्छा, रुचि एवं कार्य-प्रणाली एक होती है, वहाँ अपार आनंद का स्रोत उमड़ता रहता है। जहाँ दोनों में विरोध होता है, जहाँ नाना प्रकार के अंतर्द्वन्द्व चलते हैं, वहाँ आत्मिक शांति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। दोनों का दृष्टिकोण एक होना चाहिए, दोनों की इच्छा रुचि एवं कार्य-प्रणाली एक होनी चाहिए, तभी जीवन में सच्ची शांति के दर्शन हो सकते हैं। 

-अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1947 पृष्ठ 3

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