गुरुवार, 23 मार्च 2017

👉 साहस के रास्ते हजार

🔴 भाई परमानंद क्रांतिकारियों में अप्रतिम साहस के लिए प्रसिद्ध थे। कैसी भी संकटपूर्ण घडी में भी उन्होंने भयभीत होना नहीं सीखा था। इसलिए कई बार वह ऐसे काम भी कर लाते थे जो और कोई भी बुद्धिमान् क्रांतिकारी नही कर पाता था।

🔵 साहस को इसी से तो मनुष्य जीवन की सबसे बडी योग्यता कहा गया है। हिम्मत न हो तो बडी से बडी योजनाएँ धरी की धरी ही रह जाती है। पर साहसी व्यक्ति रेत में भी फूल उगा लेते है।

🔴 बम बनाने की योजना बन गई। विस्फोटक आदि सब सामान तो जुटा लिया गया, पर बमों के लिए लोहे के खोल (शेल) कहाँ से आयें, यह एक समस्या थी। ऐसी घडी में भाई परमानंद को याद किया गया।

🔵 बडी देर तक विचार करने के बाद उन्होंने एक योजना बना ही डाली। काम था तो जोखिम का पर "हिम्मते मरदॉं मददे खुदा" वाली कहावत सामने थी, भाई परमानंद ने अमरसिंह को साथ लिया और वहाँ से चल पडे।

🔴 उन्होने अमरसिंह को सारी योजना समझाई। अमरसिंह को एकाएक तो विश्वास नहीं हुआ कि एक अंग्रेज को चकमा देकर बमों के खोल कैसे बनवाए जा सकते हैं, पर वह परमानन्द की हिम्मत को जानते थे, इसलिए साथ-साथ जीने-मरने के लिए तैयार हो गए। अगले ही क्षण वे एक लोहा फैक्ट्री के सामने खडे हुए थे। 

🔵 सब कुछ स्वाभाविक तरीके से ही हो सकता था। बातचीत से लेकर हाव-भाव तक नकली बात तभी चल सकती थी, जब वह पूरी हिम्मत के साथ बयान की गई हो। थोडा भी सकपका जाने या अस्वाभाविक प्रतीत होने पर तुरंत गिरफ्तार होने का भय था, सो तो था ही एक बडी भारी योजना के विफल हो जाने का अपयश भी था।

🔴 परमानद भाई नकली माली और अमरसिंह मजदूर बनकर, गये थे। अंग्रेज मैनेजर से बोले-साहब सर सुंदरसिंह मजीठिया के बगीचे को सजाने के लिए लोहे के खंभे लगाए गए हैं। आपने देखा ही होगा, हमारे साहब की इच्छा है कि उनके ऊपर लोहे के गुंबज लगाए जाएँ ताकि शोभा और बढे ?

🔵 सर सुंदरसिंह मजीठिया हिंदुस्तानी पर अंग्रेजी ''सर '' की उपाधि प्राप्त-साहब बहादुर भला इनकार कैसे करते ? बोले कितने खोल चाहिए, हिसाब लगाने में जरा भी कम अकली से अंग्रेज मैनेजर को संदेह हो सकता था। साहस की यही तो पहचान है कि हृदय और मुख में जरा शिकन न आए भय पास न फटके।

🔴 यही दो हजार आवश्यक होंगे, नकली माली बने परमानंद ने कहा- अफसर थोड़ा चौंका तो पर परमानंद के साहस ने सब कुछ ढॉप लिया। आर्डर तय हो गया। १ सप्ताह में खोल बन जाने की साई तय हो गई।

🔵 ठीक एक सप्ताह बाद उसी तरह बमों के खोल ले आए और मैनेजर को कुछ भी भान न हुआ। वह तो कभी पता न चलता यदि कुछ क्रांतिकारी बंदी न बना लिए जाते और उनके साथ की बात का भंडा-फोड़ न हो जाता।

🔴 मुकदमा चला। कचहरी में अग्रेज मैनेजर भी उपस्थित हुआ। उसने अपनी भूल तो स्वीकार कर ली, पर यह कहे बिना वह भी न रहा-परमानंद सचमुच गजब का साहसी है, मुझे भी धोखा दे गया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 95, 96

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