शुक्रवार, 24 मार्च 2017

👉 आप का मन

🔴 मन की शरीर पर क्रिया एवं शरीर की मन पर प्रतिक्रिया निरंतर होती रहती है। जैसा आप का मन, वैसा ही आप का शरीर, जैसा शरीर, वैसा ही मन का स्वरूप। यदि शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा है, तो मन भी क्लांत, अस्वस्थ एवं पीड़ित हो जाता है। वेदांत में यह स्पष्ट किया गया है कि समस्त संसार की गतिविधि का निर्माण मन द्वारा ही हुआ है।

🔵 जैसा हमारी भावनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ अथवा कल्पनाएँ हैं, तदनुसार ही हमें शरीर और अंग-प्रत्यंग की बनावट प्राप्त हुई है। मनुष्य के माता-पिता, परिस्थितियाँ, जन्मस्थान, आयु, स्वास्थ्य, विशेष प्रकार के भिन्न शरीर प्राप्त करना, स्वयं हमारे व्यक्तिगत मानसिक संस्कारों पर निर्भर है। हमारा बाह्य जगत हमारे प्रसुप्त संस्कारों की प्रतिच्छाया मात्र है।

🔴 संगम अपने आप में न निकृष्ट है, न उत्तम। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन के पश्चात् हमें प्रतीत होता है कि यह वैसा ही है, जैसी प्रतिकृति हमारे अंतर्जगत में विद्यमान है। हमारी दुनियाँ वैसी ही है, जैसा हमारा अंत:करण का स्वरूप।

🔵 भलाई, बुराई, उत्तमता, निकृष्टता, भव्यता, कुरूपता, मन की ऊँची नीची भूमिकाएँ मात्र हैं। हमारे अपने हाथ में है कि हम चाहे ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की भट्टी में भस्म होते रहें और अपना जीवन शूलमय बनाएँ अथवा सद्गुणों का समावेश कर अपने अंत:करण में शांति स्थापित करें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
🌹 -अखण्ड ज्योति-फरवरी 1946 पृष्ठ 4

👉 लक्ष्मीजी का निवास

🔶 एक बूढे सेठ थे। वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव। आज यहाँ तो कल वहाँ!! 🔷 सेठ ...