गुरुवार, 30 मार्च 2017

👉 अपने को आवेशों से बचाइए

🔵 जीवन को समुन्नत देखने की इच्छा करने वालों के लिए यह आवश्यक है कि अपने स्वभाव को गंभीर बनाएँ। उथलेपन लड़कपन, छिछोरापन की जिन्हें आदत पड़ जाती है, वे गहराई के साथ किसी विषय पर विचार नहीं कर सकते। किसी समय मन को गुदगुदाने के लिए बालक्रीड़ा की जा सकती है, पर वैसा स्वभाव न बना लेना चाहिए। आवेशों से बचे रहने की आदत बनानी चाहिए जैसे समुद्र तट पर रहने वाले पर्वत, नित्य टकराते रहने वाले समुद्र की लहरों की परवाह नहीं करते। इसी प्रकार हमको भी उद्वेगों की उपेक्षा करनी चाहिए। खिलाड़ी खेलते हैं, कई बार हारते-हारते जीत जाते हैं, कई बार जीतते-जीतते हार जाते हैं, परंतु कोई खिलाड़ी उसका अत्यधिक असर मन पर नहीं पड़ने देता।

🔴 हारने वालों के होठों पर झेंप भरी मुस्कराहट होती है और जीतने वाले के होठों पर जो मुस्कराहट रहती है, उसमें सफलता की प्रसन्नता मिली होती है। इस थोड़े से स्वाभाविक भेद के अतिरिक्त और कोई विशेष अंतर जीते हुए तथा हारे हुए खिलाड़ी में नहीं दिखाई पड़ता। विश्व के रंगमंच पर हम सब खिलाड़ी हैं। खेलने में रस है, वह रस दोनों दलों को समान रूप से मिलता है। हार-जीत तो उस रस की तुलना में नगण्य चीज है। दु:ख-सुख, हानि-लाभ, जय-पराजय के कारण उत्पन्न होने वाले आवेशों से बचना ही योग की सफलता है। 

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
-अखण्ड ज्योति-मई 1947 पृष्ठ 5 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 आपसी मतभेद से विनाश :-

🔵 एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची. उसने पास के घने पेड़ के नीच...