रविवार, 26 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 47)

🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 कोई सद्विचार तभी तक सद्विचार हैं जब तक उसका आधार सदाशयता है। अन्यथा वह असद्विचारों के साथ ही गिना जायेगा। चूंकि वे मनुष्य के जीवन और हर प्रकार और हर कोटि के असद्विचारों विष की तरह की त्याज्य हैं। उन्हें त्याग देने में ही कुशल, क्षेम, कल्याण तथा मंगल है।

🔵 वे सारे विचार जिनके पीछे दूसरों और अपनी आत्मा का हित सान्निहित हो सद्विचार ही होते हैं। सेवा एक सद्विचार है। जीव मात्र की निःस्वार्थ सेवा करने से किसी को कोई प्रत्यक्ष लाभ तो होता दीखता नहीं। दीखता है उस व्रत की पूर्ति में किया जाने वाला त्याग और बलिदान। जब मनुष्य अपने स्वार्थ का त्याग कर सेवा करता है, तभी उसका कुछ हितसाधन कर सकता है। स्वार्थी और सांसारिक लोग सोच सकते हैं कि अमुक व्यक्ति में कितनी समझ है, जो अपनी हित-हानि करके अकारण ही दूसरों का हित साधन करता रहता है। निश्चय ही मोटी आंखों और छोटी बुद्धि से देखने पर किसी का सेवा-व्रत उसकी मूर्खता ही लगेगी। किन्तु यदि उस व्रती से पता लगाया जाय तो विदित होगा कि दूसरों की सेवा करने में वह जितना त्याग करता है, वह उस सुख—उस शान्ति की तुलना में एक तृण से भी अधिक नगण्य है, जो उसकी आत्मा अनुभव करती है।

🔴 एक छोटे से त्याग का सुख आत्मा के एक बन्धन को तोड़ देता है। देखने में हानिकर  लगने पर भी अपना वह हर विचार सद्विचार ही है जिसके पीछे परहित अथवा आत्महित का भाव अन्तर्हित हो। मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य लोक नहीं परलोक ही है। इसकी प्राप्ति एकमात्र सद्विचारों की साधना द्वारा ही हो सकती है। अस्तु आत्म-कल्याण और आत्म-शान्ति के चरम लक्ष्य की सिद्धि के लिए सद्विचारों की साधना करते ही रहना चाहिए। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 2)

🔴 दूसरा वाला प्रयोग हमने किया- साधु का। जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाल...