शुक्रवार, 24 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 24)

🌹 प्रखर प्रतिभा का उद्गम-स्रोत 

🔵 अनगढ़ और पुरुषार्थी, दो स्तर के लोग आम जनता के बीच पाये जाते हैं। उन्हीं को गरीब-अमीर व सफल-असफल भी कहते हैं, किंतु इन सबसे ऊँचा एक और स्तर है, जिसे देवमानव कहकर सराहा जाता है। प्रतिभाशाली उपयुक्त सफलताएँ पाते हैं; भले ही उसका दुरुपयोग करके अपयश के भाजन ही क्यों न बनें, किंतु जिनने अपने गुुण-कर्म-स्वभाव को सुनियोजित व सुसंस्कृत बना लिया है, उनके लिये आत्मिक संतोष, लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह, तीनों ही सुरक्षित रहते और दिन-दिन समुन्नत होते जाते हैं।                

🔴 वस्तुत: व्यक्तित्व का परिष्कार और उदात्तीकरण ही वह योगाभ्यास है, जिसके माहात्म्य को लोक और परलोक की अभीष्ट सफलताएँ देने वाला बताया गया है। प्रखर प्रतिभा का उद्गम-स्रोत ईश्वर है। जिसे दूसरे शब्दों में सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय भी कहा जा सकता है। मनुष्य-जीवन में वह गरिमामयी आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के रूप में अवतरित होता है। पूजा-उपासना के समस्त कर्मकाण्डों का उद्देश्य इसी आंतरिक वरिष्ठता का सम्पादन और अभिवर्द्धन करना है।  

🔵 मशीनों में बिजली का करेंट कम मात्रा में पहुँचता है तो उनकी चाल बहुत धीमी पड़ जाती है, पर जैसे-जैसे वह विद्युत् प्रवाह बढ़ता है, वैसे-वैसे ही उन सब में तेजी, गति और शक्ति बढ़ती जाती है। चेतना का कामचलाऊ अंश तो प्राणिमात्र में रहता है, जिससे वह किसी प्रकार अपनी जीवनचर्या चलाता रह सके। यह जन्मजात है, किंतु जब कभी इसकी अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता पड़ती है तो वह योग और तपपरक साधना करता है। इन दोनों का तात्पर्य प्रकारांतर से प्रतिभा और सेवा-साधना में सरलता अनुभव होने की प्रवृत्ति ही समझी जा सकती है।     
    
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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