बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 March

🔴 आत्म-ज्ञान का सम्पादन और आत्म केन्द्र में स्थिर रहना मनुष्य मात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य है। आत्मा का ज्ञान चरित्र के विकास से मिलता है। अपनी बुराइयों को छोड़कर सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा इसी से दी जाती है कि आत्मा का आभास मिलने लगे। आत्म सिद्धि का एक मात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीव मात्र की सेवा करना है। इन सद्गुणों का विकास न हुआ तो आत्मा की विभूतियाँ मलिनताओं में दबी हुई पड़ी रहेंगी।

🔵 क्रोध अन्धा होता है। वह केवल उस ओर देखता है जिसे दुख का कारण समझता है, या अपनी कामनाओं का बाधक मानता है। और उसका नाश हो, उसे हानि, दुःख पहुँचे, क्रोधी का यही लक्ष्य होता है। क्रोधी व्यक्ति कभी अपने बारे में नहीं सोचता। मेरी भी कोई भूल है, कुछ मैंने भी किया है, या जो मैं करने जा रहा हूँ, उसके क्या परिणाम होंगे? इनके बारे में कुछ भी नहीं सोचता। इसके कारण बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं।

🔴 परिस्थितियों पर विचार करने के लिये मनुष्य को सदैव गंभीरता से काम लेना चाहिये। आज जैसी स्थिति कल भी रहेगी यह सोचना अबुद्धिमत्तापूर्ण है। हम साहस, शौर्य और कर्मठता से काम करें तो असफलता को सफलता में, निर्धनता को धन प्राप्ति में, अस्वस्थता को उत्तम स्वास्थ्य में क्यों नहीं बदल सकते? थोड़ा समय ही तो लगेगा। एक दिन में किसी को सफलता मिली भी हैं? फिर आप ही उतावले क्यों होते है। धैर्य रखिये और कठिनाइयों से लड़ पड़िये। आपका खराब समय जरूर टल जायेगा। गरीबी दूर होगी। जरूर आपके स्वास्थ्य में परिवर्तन होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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