मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

👉 चरवाहे की सम्पत्ति

🔴 ईरानी शाहंशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहाँ उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हो गई। नाम था- मुहम्मद अलीवेग। चरवाहा होते हुए भी उसकी हाजिर जबावी तथा व्यक्तित्व से शाह बड़े प्रभावित हुए और लौटते समय उसे भी अपने साथ ले आए।
 
🔵 मुहम्मद अलीवेग को राज्य का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। यद्यपि वह एक निर्धन परिवार का था, इतनी धन-दौलत को देखकर फिर भी उसका मन तनिक भी विचलित न हुआ। वह अपने को कोषालय के समस्त धन का रक्षक मानता था। इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उसके जीवन में सादगी थी। शाह अब्बास के बाद उनका अल्प वयस्क पौत्र शाह सफी राज सिंहासन पर आसीन हुआ। किसी ने शाह के कान भर दिए कि मुहम्मद अली राज्य के धन का दुरुपयोग करता है। शाह ने उस प्रकरण को जाँच के लिए अपने पास रखा और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुँचे।
 
🔴 शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। थोड़ी-सी वस्तुओं के अतिरिक्त वहाँ कुछ दिखाई ही न दे रहा था। शाह निराश होकर लौटने लगा, तो खोजियों के संकेत पर शाह की दृष्टि एक बंद कमरे की ओर गयी। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला था। उन्होंने पूछा-''इसमें क्या चीज है, जिसके लिए इतने मजबूत ताले लगाये हैं।''

🔵 तुरंत ताले खोल दिए गए। शाह ने कक्ष के मध्य मेज पर एक लाठी, शीशे की सुराही आदि बर्तन तथा पोशाक और दो मोटे कंबल देखे। मुहम्मद ने कहा-'' जब स्वर्गीय शाह मुझे यहाँ लाए थे उस समय मेरे पास यही वस्तुएँ थीं और आज भी मेरे पास अपनी कहने को यही हैं। मैं इससे प्रेरणा ग्रहण करता और उसी स्तर के जीवन का अभ्यास बनाए रखता हूँ।'' युवा बादशाह इस आदर्शनिष्ठा को देखकर नत-मस्तक हो गया।
  
🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 16

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