गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

👉 आत्मिक प्रगति का अवलम्बन :- सेवा-साधना

🔵 दो वस्तुओं के परस्पर घुल-मिल जाने पर तीसरी नयी वस्तु बन जाती है। नीला और पीला रंग यदि मिला दिया जाय तो हरा बन जाता है। रात्रि और दिवस के मिलन को सन्ध्या तथा दो ऋतुओं की मिलन-वेला को सन्धिकाल के नाम से पुकारा जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में आत्मतत्त्व की उपलब्धि के लिए दो प्रमुख आधार हैं योग एवं तप। इन दोनों को सम्मिलित कर देने पर जो तीसरी आकृति सामने आती है, उसे सेवा कहते हैं। जहाँ आदर्शों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की प्रक्रिया योग कहलाती है, वहीं लोभ, मोह, अहंकार विलास आदि बन्धनों -कुसंस्कारों को निरस्त करने के लिए किया गया संघर्ष तप कहलाता है। यह संघर्ष सत्प्रयोजनों के, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त ही किया जाता है।

🔴 योग व तप के दोनों सरञ्जाम जुट जाने पर सेवा भावनाओं का उदय होता है। योग से उदार आत्मीयता के रूप में परमार्थ परायणता की, सदाशयता की अन्तःप्रेरणा उठने लगती है। उसकी पूर्ति के निमित्त अपव्यय से शक्ति स्रोतों को बचाना और उस बचत को सदुद्देश्यों के निमित्त लगाना पड़ता है। यह नियोजन ही तप है। सेवा साधना में निरत व्यक्ति योगी व तपस्वी का सम्मिलित स्वरूप होता है, यदि यह कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।

🔵 अध्यात्म क्षेत्र में ‘भज-सेवायाम्’ से ‘भजन’ शब्द बना है। भजन का सीधा-सादा एक ही अर्थ है सेवा। भजन-याने दिखावा, कर्मकाण्ड, भक्ति का प्रदर्शन, जोरों से नामोच्चारण इत्यादि नहीं अपितु ‘सेवा’। सेवा भी किसकी? इसका एक ही उत्तर है-आदर्शों की। आदर्शों का समुच्चय ही भगवान् है। स्थायी सेवा वही है, जिसमें व्यक्ति को पीड़ा से मुक्ति दिलाने-साधन दिलाने के साथ अपने पैरों पर खड़ा करने के साथ, इन सबके एक मात्र आधार आदर्शों के प्रति उसे निष्ठावान् बना दिया जाय। यही सेवा सच्ची सेवा है। उसे पतन-निवारण व आदर्शों के साथ संयुक्तीकरण भी कह सकते हैं। दुखी को सुखी व सुखी को सुसंस्कृत बनाने का आत्यांतिक आधार एक ही है- आदर्शों को आत्मसात् करना। किसने कितना भजन किया, कितना आध्यात्मिक परिष्कार उनका हुआ, इसका एक ही पैमाना है। वह यह कि सेवा धर्म अपनाने के लिए उसके मन में कितनी ललक उठी, लगन लगी, अन्दर से मन हुलस उठा। यही व्यक्तित्व का सही मायने में परिष्कार भी है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 17

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