रविवार, 26 फ़रवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Feb 2017

🔴 भाग्य का रोना रोने का अर्थ तो इतना ही समझ में आता है कि हम अपने कर्म के लिये सचेत नहीं हो पाये हैं। अपनी शक्तियों का दुरुपयोग ‘अब’ नहीं तो ‘तब’ किया था, जिसका कटु आघात भोगना पड़ रहा है। पर प्राकृतिक विधान के अनुसार तो यह भाग्य अपनी ही रचना है। अपने ही किए हुए का प्रतिफल है। मनुष्य भाग्य के वश में नहीं है, उसका निर्माता मनुष्य स्वयं है। परमात्मा के न्याय में अभेद देखें तो यही बात पुष्ट होती है कि भाग्य स्वयं हमारे द्वारा अपने को सम्पन्न करता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं है।

🔵 विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट उत्पन्न होती है, उससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जागृत कर सकते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी कसौटी मात्र है। विपत्तियों की तुला पर जो अपनी सहन-शक्तियों को तौलते रहते हैं, वही अन्त में विजयी होते हैं, उन्हीं को इस संसार में कोई सफलता प्राप्त होती है।

🔴 मनुष्य! तुम्हें शरीर इसलिए नहीं मिला कि तुम उस पर अत्याचार करते हुए उसकी मिट्टी खराब कर दो! तुम्हें संसार के भोग इसलिए नहीं दिये गए कि तुम उन पर वुभुक्षित पशुओं की भाँति टूट पड़ो। तुम्हें मन, बुद्धि और आत्मा इसलिए नहीं मिली कि तुम उनमें द्वन्द्व कराओ। तुम्हें रात और दिन, आलोक और अन्धकार इसलिए नहीं दिये गए कि तुम उनको जैसे चाहो प्रयोग में लाओ। तुम्हारे साथ विवेक और सदाशयता को इसलिए नहीं भेजा गया कि तुम उन्हें धोखा दो। संसार में तुम्हारा अवतरण इसलिये नहीं हुआ कि तुम उसे धधकता नरक कुण्ड बना दो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...