गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Feb 2017

🔴 जो मनुष्य जितनी अधिक कामना रखता है, वह उतना ही अधिक दरिद्र रखता है। उसकी व्यग्रता उतनी बढ़ जाती है और उसका मन विविध तृष्णाओं की और दौड़ता रहता है। मनुष्य की विषय विविधता ही उसको पतन की ओर ले जाती है और पतनोन्मुख मनुष्य से किसी सदाशयता की आशा नहीं की जा सकती। उसका सन्तोष नष्ट हो जाता है और इस प्रकार उसे संसार में सभी प्राणी अपने से अधिक सुखी दिखाई देते हैं, जिससे उसे औरों से ईर्ष्या और अपने से खीझ होने लगती है। वह हर समय हर बात पर असंतुष्ट रहता है, जिससे उसमें क्रोध का बाहुल्य हो जाता है। क्रोध से विवेक नष्ट हो जाता है और विवेक के विनाश से वह सर्वनाश की ओर बड़ी तीव्र गति से अग्रसर हो पड़ता है।

🔵 क्षणिक सुख के लिए अपने जीवन लक्ष्य को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं मान सकते। साँसारिक कामनायें अमृत तत्व की प्राप्ति नहीं करा सकतीं। उनका प्राप्त कर लेना किसी प्रकार श्रेयस्कर नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी मूल सत्ता से बिछुड़ जाने के कारण दुःखी है। चिरन्तन शान्ति के लिए उसी परमात्मा की ही शरण लेनी होगी।

🔴 कर्म करते हुए मनुष्य से अज्ञान-वश त्रुटियाँ हो सकती हैं, किन्तु निष्काम भावना के कारण उसके सात्विक लक्ष्य पर किसी तरह का आक्षेप नहीं आता। लक्ष्य की स्थिरता ईश्वर के प्रति अनन्य भाव रखने से आती है। दोषों, त्रुटियों और भूलों से बचाव करना भी ईश्वरीय-ज्ञान के प्रकाश में ही संभव है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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